Friday, March 21, 2014

What was your first tweet?

2006 में जब एक ऐसे प्लेटफार्म की शुरूआत हुई जो सिर्फ 140 कैरेक्टर्स में अपनी बात लिखने की इज़ाजत देता था. उस वक्त किसी को भी नहीं पता था कि कुछ लफ्जों में लोग इतनी बड़ी बड़ी बातें कह जाएंगे.

हम बात कर रहे हैं सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर की. किसी ने सोचा भी नहीं था कि आठ साल बाद यह सोशल नेटवर्किंग साइट ऐसा प्लेटफार्म बन जाएगा जहां पर लोग नए नए आइडियाज दे सकेंगे, सेलिब्रिटीज और बड़ी हस्तियों से डायरेक्ट कनेक्ट हो जाएंगे और अपनी भावनाओं को इतनी आजादी से व्यक्त कर पाएंगे.

ट्विटर अपना 8वां जन्मदिन सेलिब्रट कर रहा है. इस अवसर पर ट्विटर ने लोगों से उसके साथ जुड़ने के लिए धन्यवाद दिया है. इस जन्मदिन पर ट्विटर ने लोगों को उनके पहले ट्विट (#FirstTweet) को देखने का मौका दिया है और लोगों को इस हैश टैग के साथ रिट्वीट भी करने के लिए भी कहा है.



आप सिर्फ अपना ही नहीं, यह भी देख सकते हैं कि आपके पसंदीदा सेलिब्रिटी, पसंदीदा कॉमेडियन, स्टार और दोस्तों ने  पहली बार ट्वीटर पर क्या लिखा था. आप भी अपना #FirstTweet देख सकते हैं. आपको बस इस लिंक पर क्लिक करना है.http://first-tweets.com


इस लिंक को ओपने करने के बाद आप जिस किसी व्यक्ति का भी #FirstTweet देखना चाहते हैं बस उसका @USERNAME टाइप करना है.

Saturday, February 15, 2014

Gunday movie review: आपका दिल लूट लेंगे ये 'गुंडे'

बहुत सालों बाद शोले के जय-वीरू जैसी दोस्ती पर्दे पर देखने को मिलेगी. फिल्म को देखकर आपके बचपन की यादें ताजा हो जाएंगी जब सभी दोस्तों की नजर एक ही खूबसूरत लड़की पर रहती थी और सब बारी-बारी अपनी किस्मत आजमाते थे. फिल्म के कुछ डॉयलाग बहुत ही मजेदार है. फिल्म के सबसे अच्छी बात तो ये है कि यह परिवार के साथ देखने के लिए साफ-सुथरी है, कपल्स के लिए इसमें रोमांस है, एक्शन फिल्मों को पसंद करने वाले लोगों के लिए शानदार एक्शन है. अब रोमांस का एक नया ट्रेंड चल चुका है जिसे ब्रोमांस (Bromance) कहते हैं. इस फिल्म में भी रनवीर सिह और अर्जुन कपूर का ब्रोमांस भरपूर देखने को मिला है.

हां, इतना जरूर है हर एक सीन को आप पहले ही समझ जाएँगे कि आगे क्या होने वाला है फिर भी आपकी दिलचस्पी फिल्म को देखने में बनी रहेगी.

Story-

फिल्म में कुछ भी नया नहीं है. लेकिन बाजवूद आप बोर नहीं होंगे. फिल्म की शुरूआत भारत और बांग्लादेश के विभाजन से होता है. इस दौरान बहुत से रिफ्यूजी भारत आ जाते हैं और उन्हीं में विक्रम (Ranveer Singh) और बाला (Arjun Kapoor) भी होते हैं. हालात ऐसे हैं कि वह खाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है. शुरूआत कोयला बेचने से होती है और देखते ही देखते वे दोनों कोलकाता के सबसे मशहूर 'गुंडे' बन जाते हैं. जो पुलिस के लिए तो मुजरिम हैं लेकिन गरीब लोगों के लिए मसीहा से कम नहीं. इन गुंडो को कैबरे डांसर नंदिता सिंह (प्रियंका चोपड़ा) से प्यार हो जाता है. दोनों साथ-साथ प्रपोज भी करते हैं. लेकिन नंदिता तो किसी एक को ही चुनेगी. फिर क्या, एक दूसरे पर जी-जान छिड़कने वाले दोस्त एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं. दूसरी तरफ, इन गुंडो के सफाया के लिए एसीपी सत्यजीत सरकार (इरफान खान) को बुलाया जाता है. सत्यजीत सरकार का एक ही फंडा है 'फूट डालो और राज करो'. सत्यजीत सरकार किस तरह इन गुंडो को फंसाने के लिए जाल बुनता है कि दोनों पूरी तरह उसमें फंस जाते हैं. यही क्लाइमेक्स है.

Acting-
रनवीर सिंह ने एक बार फिर शानदार अभिनय किया है और अपने अभिनय से अर्जुन कूपर पर भारी पड़े है. फिल्म में अर्जन कपूर का ग्रे शेड है मतलब कभी वह आपके लिए हिरो होंगे तो कभी खुद ही फिल्म के विलने लगने लगते हैं. दोनों अपने रोल में फिट बैठे हैं और इनका एक्शन सीक्वेंस बहुत ही शानदार तरीके से फिल्माया गया है. प्रियंका चोपड़ा ने भी इस फिल्म में अपने डांस के साथ अभिनय को बखूबी निभाया है. इरफान खान एसीपी की भूमिका में जान डाल देते हैं.


म्यूजिक और निर्देशन-

यशराज बैनर तले बनीं इस फिल्म के गाने तो पहले से ही हिट रहे हैं. दिल में बजी घंटिया.., जिया.., तेवर सुनने में भी अच्छे और देखने में मजेदार. डायरेक्टर अली अब्बास जफर अच्छा निर्देशन किया है. वह एक पुरानी कहानी को नए तरीके से दिखाने और पर्दे पर रोमांच, थ्रिल, एक्शन और ड्रामा को पूरी तरह उतारने में सफल रहे हैं. फिल्म के कुछ डायलाग ऐसे है जो आपके दिल को छू जाएंगे और आपके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देंगे.

क्यों देखें-
इस फिल्म में दोनों हिरोज की केमेस्ट्री खूब जम रही है. पैसा वसूल फिल्म के लिए जो भी जरूरी होता है वह सब कुछ इस फिल्म में है- रनवीर और अर्जुन का एक्शन, उनके मसल्स और प्रियंका का सडक्टिव डांस, दिल को छू लेने वाले डॉयलाग. कुल मिलाकर इस हफ्ते अगर आप यह फिल्म देखने की सोच रहे हैं तो आप इन्जॉय करेंगे.


Tuesday, February 04, 2014

Facebook gets nostalgic with LookBack on its birthday

फेसबुक के दस साल पूरे होने पर अपने यूजर्स से गिफ्ट लेने के बजाय एक बहुत ही प्यारा सा गिफ्ट दिया है. इस गिफ्ट में फेसबुक ने आपको ऐसा फीचर दिया है जिसके द्वारा आप अब तक किए गए सभी पोस्ट के हाईलाइट्स को एक फिल्म के रूप में देख पाएंगे.



इस फिल्म का नाम “Look Back” वीडियो दिया गया है. इस वीडियो में आपको 20 सबसे ज्यादा लाइक की गईं तस्वीरें, स्टेटस और लाइफ इवेंट्स को म्यूजिक के साथ दिखाया जाएगा. इसकी शुरूआत आपके उस तस्वीर के साथ होगी जो आपने सबसे पहले फेसबुक पर लगाई होगी. यह थोड़ा दिलचस्प औऱ ज्यादा सेंटिमेंटल है क्योंकि आपकी बहुत ही पुरानी यादें ताजा हो जाएंगी. इसकी एक झलक तो आपको भावुक भी बना सकती हैं जब आपके फेसबुक पर अपने first moment को देखेंगे.


आप अपने फेसबुक फिल्म को इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं.- www.facebook.com/lookback


यानि फेसबुक आपके स्टार्ट से लेकर अब तक के कुछ अपलोड्स को अपने तरीके से दिखाएगा. यह थोड़ा दिलचस्प भी है. इसमें आपके अब तक किए गए लाइक, मोस्ट शेयर्ड और पॉपुलर फोटो का एक फिल्म तैयार किया गया जिसे आप देख सकते हैं और उस फिल्म को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते हैं.

फेसबुक के 10 साल के होने पर इसके संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने अपना वीडियो शेयर किया और बताया कि सभी यूजर्स अपने बीते साल को इसके जरिए देख सकते हैं.

Wednesday, January 29, 2014

काम ना आया स्टार पावर: 'मोदी फैक्टर' से नहीं इस वजह से सलमान की नहीं हुई 'जय हो'!

बॉलीवुड सपुरस्टार सलमान खान की फिल्म 'जय हो' की बॉक्स ऑफिर पर कुछ अच्छी ओपनिंग नहीं मिली. पिछले साल उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई थी तो उनके फैंस को यह उम्मीद थी कि सलमान इस बार थोड़ा अलग मसाला और इंटरटेनमेंट पैकेज लोगों को दिखाने वाले हैं. रिलीज होने से पहले यह कयास लगाए जा रहे थे फिल्म आम आदमी से जुड़ी हुई है तो हिट होगी. क्योंकि जब आम आदमी केजरीवाल हिट हैं तो सलमान क्यों नहीं?
लेकिन पिछली फिल्मों की तुलना में इस बार सलमान खान का सुपरस्टार पॉवर काम नहीं आया. अगर किसी और अभिनेता की फिल्म के साथ ऐसा होता तो यही कहा जाता कि फिल्म की स्क्रिप्ट ढ़ीली थी. स्टोरी लाइन बकवास थी, एक्टिंग अच्छी नहीं की, म्यूजिक कुछ खास नहीं था या फिर जरूरत से ज्यादा लंबी फिल्म थी आदि आदि... फिर यह बात यहीं खत्म हो जाती. तो फिर सलमान खान के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ? लेकिन यहां तो कुछ और ही मामला है. यहां नरेंद्र मोदी फैक्टर को भुनाया जा रहा है.
फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा का कहना है कि मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से ने सलमान की फिल्म जय हो का बहिष्कार कर दिया क्योंकि मोदी को लेकर सलमान का बयान उन्हें नापसंद था. इसी वजह से फिल्म पहले दिन अच्छी कमाई नहीं कर पाई. सुनकर बड़ा ही बेतुका लगा कि एक फिल्म समीक्षक ऐसा कैसे कह सकता है? आकड़े यह भी तो साबित कर सकते हैं कि उनकी फिल्म में वह दम नहीं कि लोगों को थियेटर तक खींचकर लाए. जिसका काम ही है हमारा मनोरंजन करना उसकी फिल्म को उनके फैंस सिर्फ इसलिए देखने नहीं गए क्योंकि उन्होंने मोदी की प्रंशसा की थी. ये बात कुछ हजम नहीं हुई. खैर...
अगर इस बात में सच्चाई है तो इसका मतलब तो यह है कि वे चुनिंदा लोग जो सलमान का विरोध कर रहे हैं अपनी खुद की राय रखते ही नहीं. वह दूसरों की राय को ही अपनी राय बना लेते हैं. सलमान खान ने कहा था, 'जब नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट मिल गई है तो वह गुजरात दंगों के लिए माफी क्यों मांगे?' सलमान खान ने उसी बात को रिपीट किया था जो कोर्ट ने कहा, मीडिया ने छापा. क्या इस देश के लोगों को न्यायिक प्रणाली पर भरोसा नहीं है? या फिर सलमान खान अब एक्टिंग छोड़कर समाजसेवा शुरू करने वाले है जो वह लोग जो चाहते हैं वही बोलें.
फैंस क्या यह भूल गए हैं कि यहां पर हर किसी को अपनी बात कहने का हक है. लोकतंत्र है.. कहां लिखा है कि सेलिब्रिटी अपनी राय लोगों के सामने नहीं रख सकता. सलमान खान फिल्म को प्रमोट करने गुजरात गए, नरेंद्र मोदी से मिले, पतंगे उड़ाई, मीडिया से रूबरू हुए. हालांकि इस दौरान उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मोदी को वोट दीजिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाइए. हां इतना जरूर कहा था कि मोदी को मेरी जरूरत नहीं वो खुद ही पॉपुलर हैं. कई मुस्लिम संगठनों ने तो हाय तौबा मचा दिया. किसी का कहना था कि सलमान ने मुस्लिम समुदाय के भावनाओं को आहत किया है, अब उनको बॉयकॉट करो, उनकी फिल्म मत देखो.

सलमान खान के वे फैंस जिन्होंने मोदी से मुलाकात की वजह से उनका बॉयकाट किया उनसे मुझे  सिर्फ इतना ही कहना है कि सलमान खान की लाइफस्टाइल को फॉलो करें उनकी सोच को नहीं. उनके अभिनय की तारीफ करें ना कि उनके विचारों की आलोचना... फैन होने का मतलब यह नहीं है कि आप आंख बंद करके किसी को फॉलो करें. सलमान खान इंटरटेनर हैं और उन्हें इसी निगाह से देखा जाना चाहिए.
मैं भी सलमान खान की प्रशंसक हूं. मुझे पसंद है उनकी कुछ फिल्में, उनका अभिनय. मैंने 'जय हो' नहीं देखी. लेकिन कारण सिर्फ एक है कि इस फिल्म ने मुझे इतना आकर्षित नहीं किया कि मैं देखूं. एक आम इंसान की तरह वह अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं पर जरूरी नहीं कि उनकी हर बात से मैं सहमत होऊं. ऐसा भी नहीं है कि उनकी बात मुझे पसंद ना आए तो मैं उनकी फिल्मे देखाना बंद कर दूं. ऐसा पहली बार नहीं है इससे पहले भी कई सेलिब्रिटी मोदी से मिल चुके हैं. अमिताभ गुजरात के ब्रांड एंबेसडर है इसका मतलब यह है कि एंटी मोदी लोग अमिताभ की फिल्मे देखना बंद कर देंगे.
इससे क्या फर्क पड़ता है कि सलमान खान किसे प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं. इस बारे में तो हमें अपनी राय बनानी चाहिए. यहां कोई नरेंद्र मोदी को पसंद करता है तो कोई राहलु गांधी को ..कुछ लोगों किसी और को भी पीएम बनते देखना पसंद करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनी राय इस बात से बनाते है कि वो जिन्हें फॉलो करते है वह किसका भक्त है. अगर ऐसी बात है तो फिर तो हम खुद नहीं किसी और की सोच को बढ़ावा दे रहे हैं.
फिल्म समीक्षा पढ़ी जाय तो कहीं ना कहीं यह बात सामने आती है कि सलमान खान लोगों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए. सलमान लोगों को वो पैकेज देने में नाकामयाब रहे जो उनसे उम्मीद की जा रही थी. फैंस को यह भी उम्मीद भी थी कुछ कमाल कर देंगे सलमान खान इस बार जो कि नहीं हो पाया. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि उनकी फिल्म फ्लॉप हो गई.



यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम एक कलाकार को सिर्फ इसलिए टारगेट कर रहे हैं कि वह किसी राजनेता से मिलने गया. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. हमारा संविधान सबको बराबरी का हक देता है. हमें कलाकारों को जाति धर्म मजहब से परे होकर देखना चाहिए ना कि उन्हें इन बातों को लेकर टारगेटर करना चाहिए.

Monday, January 27, 2014

'ड्रग्स और शराब चलेगा क्या कर लोगी?'

अब छेड़खानी और रेप की खबरें सुननी आम बात सी हो गई है. कल रात की ही बात है जब एक लड़की के दोस्तों ने ही रेप करके उन्हें कार से बाहर फेंक दिया. ऐसी तो बहुत सारी खबरें सुनने को मिलती हैं लेकिन कल गणतंत्र दिवस था. सुरक्षा चाकचौबंद थी. पुलिस ने तो कुछ ऐसा ही दावा किया था लेकिन फिर ऐसी घटना कैसे हो गई?  कहीं ना कहीं यह पुलिस की नाकामी का ही नतीजा है.


कभी कभी अनायास ही मन में सवाल आते हैं कि क्या अपराधियों को कानून का डर क्यों नहीं? क्या उन्हें इस बात का खौफ नहीं कि एक अपराध से उनकी पुरी जिंदगी बर्बाद हो सकती है? लेकिन जिस तरह से इस क्राइम का ग्राफ ऊपर जा रहा है उससे तो यही लगता है कि लोगों में कानून और पुलिस प्रशासन का डर है ही नहीं.


डर नहीं होने का कारण भी पुलिस ही है. उनकी हरकतें, अपने काम के प्रति उनकी लापरवाही, किसी भी शिकायत को गंभीरता से ना लेना और फिर सुन भी ली तो एक्शन लेने की जरूरत तो उन्हें लगती नहीं. अब जब पुलिस ही ऐसा करेगी तो लोग डरेंगे भी क्यों?

खुद के साथ भी बड़ा ही कड़वा अनुभव रहा है. कल रात की ही बात है. कुछ ब्लैक शराब बेचने वालों से हमारी झड़प हो गई. बस वे लोग 26 जनवरी को ड्राई डें होने का फायदा उठा रहे थे. सुबह से लेकर शाम हो गई यह देखते देखते की इनका ड्रामा कब खत्म होगा. देखना इसलिए पड़ रहा था कि यह सब हमारे फ्लैट के सामने ही हो रहा था. पिछले 2 साल से देख रहे हैं कि ऐसा होता है. फर्क इतना है कि कभी हम बाहर निकलकर 

बोल देते हैं कि यहां से कहीं और जाकर यह सब काम करो. कुछ लोग है जो कि चुपचाप चले जाते हैं कुछ लोग है जो हमें यह बताने लगते हैं कि हम यहां के नहीं है तो हमें इन सब पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए और ये सब इग्नोर करना चाहिए. कुछ हद तक हम लोग इग्नोर करते भी है. क्योंकि जब दिल्ली पुलिस काम ये सब संभाल पा रही तो हम क्या करेंगे. कंप्लने भी कई बार कर चुके हैं लेकिन पुलिस ही है तो क्या काम करेगी सभी को पता है.


कल शाम के 7-8 बज रहे थे. हमने गेट खोला तो सामने यह सब चल रहा था. जब उनसे यह कहा कि प्लीज आप लोग यहां से कहीं और चले जाइए तो उनका कहना था कि रेंट पे रहते हो तो मत बोलो, तुम्हारा घर होता तो कोई और बात होती. हमने कहा- अच्छा नहीं लगता...यहां लड़कियां रहती हैं आप लोग यहां से कहीं और जाओ नहीं तो हम लोग पुलिस को कंप्लेन करेंगे. उसका कहना था कि पुलिस क्या कर लेगी? सबको ही पता है कुछ नहीं करेगी लेकिन फिर हमने कहां बहुत कुछ कर लेगी चुपचाप जाओ यहां से. उनका कहना था- नहीं जा रहे क्या कर लोगे? 


हमने फिर पुलिस को फोन किया.. सोचा दिल्ली पुलिस है कम से कम आज के दिन तो लापरवाही नहीं बरतेगी. समय से पहुंच ही जाएगी. वे लोग हमें डराने की कोशिश में हमारे गेट तक आ गए. बस अब तो बर्दाश्त के बाहर था.. ना चाहते हुए भी घर से बाहर आकर उनसे लड़ने में हम भी लग गए कि तब तक तो पुलिस पहुंच ही जाएगी. लेकिन शायद हम गलत थे. यहां पुलिस क्राइम होने के बाद ही पहुंचती है तो इतिहास रहा है फिर हमारे साथ ऐसा क्यों नहीं होता?


वे लोग बात लड़ाई से बढ़ाते-बढ़ाते हाथापाईं तक ले आए...शायद उनकी  मंशा कुछ और ही रही होगी. उन्हें लगा कि लड़कियां है डर जाएंगी.. डर तो जरूर जाती ..लेकिन शायद आदत नहीं रही डरने की,.. किसी से भी.. आश्चर्य की बात ये थी कि जो आस पास के लोग थे वे तमाशबीन की तरह देख रहे थे और शायद मजे भी ले रहे होंगे.


मैं और मेरी रूमी संगीता... जब हम आगे बढ़ने लगे तब वे लोग डरे और भगे वहां से यह कहते हुए कि आगे गली में आ जाओ फिर तुम्हें बताते हैं..अब कोई ऐसी बात बोलता है तो सच कहूं तो बर्दाश्त नहीं होता. बचपन से कभी आदत नहीं रही किसी की भी ऐसी बातें सुनने की. यहां तक कि घर में पैरंट्स ने तो हमेशा से ही सिखाया है कि जब अपनी गलती ना हो और कोई तुम्हें बेवजब परेशान करने की कोशिश करें तो उनसे लड़ो..जरूरत पड़े तो हाथ-लात घूसे  देके आओ...लेकिन डरना किसी से नहीं और कभी भी नहीं. खैर,


...उस गुस्से में तो यही लग रहा था कि अब जाकर भी देख लेते हैं गलियों में कि वे लोग क्या करते है.. गए भी लेकिन वे लोग भाग पराए. कुछ ही सकेंड में सब अपने अपने घऱों में छिप गए. पास के ही थे बस मौके का फायदा उठाकर ऐसा कर रहे थे क्योंकि उन्हें इस बात की पहले से खबर थी कि हमारे लैंडलार्ड इस समय कुछ दिनों के लिए दिल्ली में नहीं है.


...लगभग 15 मिनट बाद पेट्रोलिंग वाले का फोन आया कि हां जी क्या बात है...और आप लोगों का एड्रेस हमें नहीं मिल रहा है. बहुत आश्चर्य हुआ यह सुनकर क्योंकि पुलिस स्टेशन हमारे फ्लैट से बस आधा किलोमीटर की दूरी पर है... और उन्हें अपने एरिया में कौन सा एड्रेस कहां पर है यह भी नहीं पता..चलो जी कोई बात नहीं... लोकेशन बताया..फिर आए..परेशानी सुनी..फिर कहा- मामला शांत हो गया, अब हमारे एसआई साहब आएंगे उन्हें लिखित एप्लिकेशन दे दीजिएगा आप लोग.

वैसे ये कंप्लेन हम पहली बार नहीं कर रहे थे..इससे पहले भी हम यह लिखित कंप्लने कर चुके थे कि यहां पर शराब, ड्रग्स जैसी चीजें खुलेआम बेची जाती है. हमें बेचने से क्यों परेशानी होगी जब पुलिस ही कुछ नहीं करती..परेशानी बस इस बात से है कि यह सब हमारे रेसिडेंस के आस पास ही होता है.


हमने कहा जी ठीक है..देखते है कंप्लने के लिए पुलिस कितनी देर में आती है..लगभग आधे घंटे बाद आ गई पुलिस. झगडे की वजह पूछी, किसने किया..शुक्र है कि हमें उस इंसान के बारे में पता चल गया था जिसने इस झगड़े की शुरूआत की थी. हमने घर बताया पुलिस वहां पहुंच तो  गई लेकिन वैसा ही हुआ जैसा बहुत पहले से होता आया है. वह घर से गायब था..उसके घर की औरते पुलिसवालों से ही उलझ गईं. बजाय हमारी प्राब्लम औऱ उस आदमी को ढ़ुढ़ने के पुलिस उन्हें चुप कराने में लग गई.


सब के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि हमें कई सारे नंबर दे दिए कि जब भी ऐसा कुछ लगे तो हम उन्हें इन्फार्म कर दें. फिर वे आएंगे और ऐसी हरकतें करने वाले लोगों को अरेस्ट करेंगे. वाह रे पुलिस...


बहुत ही आश्चर्य हुआ कि अगर हमारे साथ कुछ और अनहोनी हो जाती तो पुलिस को बार बार फोन करके घर का रास्ता कौन बताता... वे लोग हमसे मारपीट करके अगर भाग जाते तो पुलिस उन्हें कैसे गिरफ्तार कर पाती. वैसे ये मारपीट से कम नहीं थी.. अकेली लड़कियों को देखकर उनके घर में घुसने की कोशिश करना ... उनसे लड़ना और फिर हाथापाई करना यह किसी अपराध से कम नहीं है. ऐसे में इतना तो हमें भी पता है कि पुलिस को क्या करना चाहिए. खासकर तब जब उनके  सामने बीसों गवाह मौजूद हैं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.


यह तो पहले से पता था कि दिल्ली पुलिस कितनी अलर्ट रहती है लड़कियों की सुरक्षा को लेकर...लेकिन कल इस बात की एक मिसाल भी दे दी इन लोगों ने. एक पल के लिए ऐसा लगा कि अगर यहां रहना है तो दिल्ली में जिसे भी रहना है वह खुद को इस काबिल बना ले कि सारे मुसीबतों से खुद ही निबट ले. पुलिस तो बस सरकार के पैसे लेती रहेगी और यह दिखावा करती रहेगी कि हां जी हम काम तो कर ही रहे हैं.. भले ही किसी का रेप हो रहा हो और उन्हें कोई उन्हें हेल्प के लिए फोन करे तो उन्हें अंग्रेजी ही समझ ना आएकि लड़की क्या बोल रही है.. भले ही कहीं 4-6 लोग लड़कियों से जबरदस्ती लड़ने की कोशिश कर रहे हों ये पुलिस के लिए कोई बड़ी बात नहीं..


लेकिन इन सब हालातों से गुजरने के बाद एक बहुत बड़ा सवाल है...कल मौका देखकर हमारे साथ लड़ने की कोशिश की.. दूसरे दिन कुछ औऱ प्लान करेंगे... अगर हमारे साथ कुछ अनहोनी हो गई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? किसी ने हमारे साथ कुछ बुरा कर दिया तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? ये कुछ ऐसे सवाल है जो कल से ही जेहन में उभर रहे हैं लेकिन कोई जवाब नहीं दिख रहा....

Tuesday, January 21, 2014

सोशल मीडिया के यूजर्स के लिए एक सीख दे गई हैं सुनंदा पुष्कर..


कुछ बातें होती है जिनमें लोग हमेशा दिलचस्पी दिखाते हैं. उन्हीं में से एक है एक्सट्रा मैरिटल अफेयर. बात चाहे किसी आम आदमी का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर हो या फिर किसी सेलिब्रिटी का ...लोग मजे भी लेते हैं और बड़े चाव से जानने की कोशिश में लगे रहते हैं.

ऐसा ही कुछ तब हुआ जब केंद्रीय मंत्री  शशि थरूर का ट्विटर अकाउंट हैक हो गया. थरूर के अकाउंट से कुछ ऐसे ट्वीट पढ़ने को मिले जिससे ऐसा लगा कि पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार और थरूर के बीच 'कुछ' चल रहा है. सब लोग ट्विटर पर मजे ले रहे थे. लेते भी क्यों नहीं..


शशि थरूर सोशल मीडिया पर अपने विचारों को बेबाकी से रखने के लिए लोकप्रिय हैं और उनकी फैन फॉलोविंग भी अच्छी खासी है. अगर आपको याद हो तो जब सुनंदा पुष्कर से उनके अफेयर की खबरें आई थीं तो लोगों ने अपनी दिलचस्पी खूब दिखाई थी. सुनंदा के चक्कर में तो थरूर ने केंद्रीय मंत्री का पद भी छोड़ना पड़ा था. इस पर चुटकी लेते हुए नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि थरूर के लिए सुनंदा 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड साबित हुईं. जवाब में थरूर ने कहा कि प्रेम की कोई कीमत नहीं होती. कुल मिलाकर मामला प्रेम का था.  लेकिन अब तो मामला सिर्फ प्यार का नहीं...सरहद पार एक पाकिस्तानी पत्रकार के साथ अफेयर का था. एक तो अफेयर,  दूसरा पाकिस्तान और तीसरा मुख्य भूमिका में थी पाकिस्तानी पत्रकार. लोग क्यों नहीं जानना चाहते...खैर,

लेकिन किसी ने सोचा नहीं था कि सुनंदा ऐसा कदम उठा लेंगी. ऑफिस से निकलते समय यह सोचा भी नहीं था घर जाकर ऐसी खबर देखने को मिलेगी. गहरा धक्का लगा यह सुनकर कि सुनंदा पुष्कर की मौत हो गई है. एक पल के लिए ऐसा लगा कि काश ये खबर झूठी होती... सुनंदा के साथ अगर कुछ गलत हो रहा था उन्हें लड़ना चाहिए था... अपने हालात से..खुद से..समाज से..मीडिाय से.. या जरूरत पड़ी तो अपने पति शशि थरूर और मेहर तरार से भी..लेकिन ये सब सोचने का क्या फायदा यहां तो कुछ और ही हो चुका था. 

पहला सवाल खुद से यही पूछा...क्या सभी परेशानियों, डिप्रेशन, बेवफाई और धोखे से बचने का रास्ता मौत ही है? ऐसी क्या स्थितियां होती हैं कि उसके आगे इंसान को अपनी जिंदगी बदसूरत लगने लगती है? परेशानियां बड़ी और जिंदगी छोटी महसूस होने लगती है? सारे रास्ते बंद दिखाई देते हैं.  कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों किया होगा...आ तो अब तक भी नहीं रहा..

सुनंदा के ट्वीटर को खंगाला तो यही सामने आाया कि वह बहुत डिप्रेस्ड चल रही थीं... लोग उनसे ज्यादा उस पत्रकार मेहर तरार को महत्ता दे रहे थे जो इस लव  ट्राएंगल में मुख्य भूमिका में थीं. सुनंदा को लग रहा था कि मीडिया हाइप मचा रहा है. यह उनकी पर्सनल लाइफ है. वैसे तो यह उन लोगों की व्यक्तिगत जीवन का ही मामला था लेकिन शायद यह बात उन्हें पहले ही सोचनी चाहिए थी कि कुछ बातें व्यक्तिगत भी होती हैं. लेकिन थरूर दंपति ने कभी कुछ व्यक्तिगत रखा ही नहीं..सब कुछ सार्वजनिक ही हुआ तो अब क्यों नहीं?

कहते हैं कि हर बात के दो पहलू होते हैं. एक सकारात्मक और एक नकारात्मक. और यह सबके साथ ही लागू होता है. सिर्फ अफेयर ही नहीं शशि थरूर को उनके विचारों के लिए भी जाना जाता है. उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं. वे सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं. जिस ट्वीटर की वजह से शशि थरूर को लोकप्रियता मिली उसी की वजह से उनकी जिंदगी से कोई खास हमेशा के लिए उनका साथ छोड़कर चला गया. लेकिन इतना जरूर है कि यह एक ऐसा उदाहरण है जिससे सोशल मीडिया पर छाए रहने वाले लोग 'सीख' ले सकते हैं. जरूरी है कुछ बातें जो पर्सनल है उन्हें पर्सनल ही रखा जाए.

मौत का रास्ता ही क्यों चुना?
जांच में यह बात सामने आ गई है कि यह मौत नेचुरल नहीं था. दवाओं के ओवरडोज से यह मौत हुई. यह पहली बार नहीं है जब इस तरह सूर्खियों में रहने वाली किसी महिला ने मौत का रास्ता चुना है. अगर आपको याद हो तो इससे पहल चांद मोहम्मद और अनुराधा बाली के प्यार की खबरें भी मीडिया में खूब छाई  रहीं. लेकिन बाद में मौत के साथ ही यह इस प्यार 2012 में  हो गया. बॉलीवुड अभिनेत्री जिया खान ने भी लव ट्राएंगल के चक्कर में अपनी जान गवां दी. उन्हें यह शक था कि उनका ब्वायफ्रेंड सूरज पंचोली का किसी और से अफेयर चल रहा है जिसकी वजह से वह उनको समय नहीं देता था.

इस सभी के मौत की एक ही वजह रही- प्यार. जहां लोग कहते हैं कि जिंदगी में प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं वहीं पर किसी की बेवफाई की वजह से इतनी खूबसूरत जिंदगी को कोई कैसे गवां सकता है? मरने के अलावा और भी तो कई रास्ते हो सकते हैं..अगर आपको किसी से शिकवा शिकायत है तो आप अपने लिए लड़ सकते हैं. स्थानीय कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं. महिलाओं के लिए इतने कानून है उनका सहारा ले सकते हैं फिर मौत ही क्यों?

यह सवाल मैं खुद से कर रही हूं ... लेकिन कोई जवाब नहीं सूझ रहा...

बस एक यही अपील है सभी महिलाओं से कि अपनी जिंदगी को किसी और को हैंडल मत करने दो. खुद के लिए जियो...खुद से इतना  प्यार करों कि किसी और का प्यार उस पर हावी ना हो... अपनी जिंदगी किसी और के प्यार के सामने तुच्छ ना लगें...

अपने लिए लड़ो...समझदार बनों!


Sunday, January 05, 2014

अब बाहर से ज्यादा घर में असुरक्षित हैं महिलाएं...

किसी ने सच ही कहा है कि आज भी आदम की बेटी हंटरों की जद में हैं, हर गिलहरी के बदन पर धारियां जरूर होंगी. 16 दिसंबर 2012 को हुए गैंगरेप के बाद देश में एक क्रांति की शुरूआत हुई. इस घटना ने लोगों की रूह को कंपा दिया. निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए.


जन आंदोलन हुए. लोगों ने सरकार के खिलाफ खूब नारे लगाए. आलोचनाएं कीं.  खूब मोमबत्तियां भी जलाईं. भाषण दिए.  कुछ तो उस आंदोलन की हवा में बह गए . कुछ ने देखादेखी कर दी. लेकिन इतना सब करने का क्या फायदा मिला?  लोगों ने इंडिया गेट से लेकर जंतर मंतर तक खूब धरने दिए. एक क्रांति आई.. लेकिन वह क्रांति नहीं आई जिसकी जरूरत थी. जरूरत थी विचारों के क्रांति की..सोच के क्रांति की.. खुद को बदलने के क्रांति की. दोषारोपण करने से क्या होता है. लोगों ने तो सरकार को दोषी ठहराया कि कड़े कानून नहीं हैं इसलिए ऐसी घटनाएं हो रही हैं. लेकिन यह हकीकत है कि कानून से डर पैदाकर अपराध को नहीं रोका जा सकता है. अपराध कम तभी होगा जब लोग खुद में बदलाव लाएंगे.

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कानून भी आए लेकिन क्या सिर्फ कानून के डर से इस क्राइम पर लगाम लगाया जा सकता है? आकड़ों पर नजर डालें तो शायद कहेंगे नहीं. आज भी रेप और छेड़छाड़ के मामलों का ग्राफ नीचे नहीं ऊपर की तरफ तेजी से बढ़ता जा रहा है.  2013 में दिल्ली में रेप के कुल 1559 मामले दर्ज हुए है जो कि 2012 की तुलना में दोगुना से भी ज्यादा है. लेकिन सबसे बड़ी चौकाने वाली बात यह है कि इसमें से 1347 रेप तो घर के अंदर ही हुए हैं जिसे किसी रिश्तेदार या फिर किसी जानने वाले ने किया है.  छेड़छाड़ के मामले 3347 दर्ज हुए जिनमें से 1445 तो घरों के अंदर के ही मामले हैं. ये मामले 2012 की तुलना में पांच गुना ज्यादा है.
ये आकड़े दिल्ली के ही है. जहां जन-आदोलन के लिए इतनी भीड़ इकट्टी तो हो गई.  लेकिन दावे के साथ कहा जा सकता है कि वो इकट्ठी भीड़ सिर्फ दिखाने के लिए ही रही होगी. अगर वे सभी लोग खुद ही यह सोच लेते कि वे महिलाओं का सम्मान करेंगे. उनकी इज्जत करेंगे.  छेड़छाड़ नहीं करेंगे. रेप नहीं करेंगे तो यहां कुछ और ही आंकड़े होते. अगर उस भीड़ ने थोड़ी भी सीख ली होती तो आज ये आकड़े देखने को नहीं मिलते.

पहले मेरे दिमाग में यह बात थी कि शिक्षा का स्तर ऊंचा हो तो इस अपराध में कमी हो सकती है. लोग पढ़े लिखे होंगे तो उनकी सोच इन सब हरकतों से परे होगी लेकिन तरूण तेजपाल और जस्टिस गांगुली ने इसे भी गलत करार दे दिया. इन लोगों ने यह साबित कर दिया कि जब इंसान यह ठान ले कि उसे अपराध करना है तो शिक्षा का कोई मतलब नहीं रह जाता. खैर...,

जो तथ्य सामने आए हैं वे तो और भी शर्मिंदा करने वाले हैं. लोग अपनी बहू-बेटियों के लिए चिंतित रहते हैं. कई बार कहते हुए भी सुना जाता है कि हमारे घर की बेटिंया बाहर सुरक्षित नहीं है. लेकिन ये आकड़े तो कुछ और ही कह रहे हैं. यहां तो महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं है. यह सच्चाई भी है. ऑफिस से बचे तो रास्ते...रास्ते से बचे तो गली-मोहल्ले... वहां से भी बच निकले तो घर... अब घर से ज्यादा सुरक्षित जगह कहां होगी जहां पनाह ली जा सके...लेकिन जब घर ही असुरक्षित हो तो कहां जाएंगे?

कहीं ना कहीं घरों के अंदर हो रहे इस रेप की वजह का कारण साफ है. महिलाएं इस बात को लेकर डरती हैं कि अगर मामला दर्ज कराया तो लोग क्या कहेंगे. पहले तो उन्हें डराया धमकाया जाता है. वे खुलकर बोल नहीं पाती. शिकायत नहीं दर्ज करा पाती क्योंकि उन्हें डर रहता है कि पता चलने के बाद समाज उन्हें किस नजर से देखेगा? उनका भविष्य क्या होगा? लेकिन अब समय यह सब सोचने का नहीं है. अपने लिए लड़ने का है. महिलाओं के जागने का है. खुद को इन सब पचड़े से निकालकर खुद के बलबूते अपनी जगह बनाने का है. डरने का नहीं डराने का है. खुलकर बोलने का है. अपने खिलाफ हो रहे अन्याय के विरोध में आवाज उठाने का है. अगर आप खुद के लिए नहीं लड़ेंगे तो कोई और आपकी मदद नहीं करेगा. इसलिए उठो..जागो..आवाज बुलंद करो और खुद के लिए लड़ो.

Saturday, January 04, 2014

हाय तौबा मचाने वालों- घर और गाड़ी से ऊपर की सोचो...

जैसे ही यह खबर आई कि केजरीवाल दस कमरों वाला डुप्ले घर ले रहे हैं कुछ लोगों में खलबली मच गई. लोगों का कहना यह था कि चुनाव से पहले तो केजरीवाल ने कहा था कि वह घर नहीं लेंगे, उनके मंत्री सरकारी गाड़ी नहीं लेंगे. अब जब लोगों ने उनके सादगी को देखकर उन्हें जनमत दे दी वह सरकारी घर और गाड़ी लेने जा रहे हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि लोगों को मंत्रियों की दिनचर्या उनके घर, उनकी गाड़ी वगैरह में इतनी दिलचस्पी क्यों है...अरे जनमत दिया है बदलाव के लिए तो पहले वह तो होने दो... हाय तौबा करने की क्या जरूरत.

बदलाव के लिए जरूरत होती है धैर्य की सब कुछ अचानक ही नहीं हो जाता . आज कांग्रेस और बीजेपी दोनों के पास जब बोलने के लिए कुछ नहीं बचा तो इन छोटी-छोटी बातों को लेकर ही टुट रहे हैं.

मुझे नहीं लगता कि अगर केजरीवाल 10 या फिर 15 कमरों वाले घर में रहे से कुछ ज्यादा फर्क पड़ने वाला है. देखना ही है तो थोड़ा इंतजार किजिए और काम देखिए. केजरीवाल को भी सिर्फ कुछ लोगों की आलोचनाओं पर ध्यान ना देते हुए अपने काम पर ध्यान लगाना चाहिए. कहते हैं ना विपक्षी होते ही इसलिए है कि वह आप पर बगुले की तरह निगाहें गड़ा कर बैठे रहें और मौका मिलते ही निगलने की कोशिश करें. यह तो उनका काम ही है जैसा कि हमने पहले दिन दिल्ली विधानसभा में भी सुना बीजेपी के डॉ. हर्षवर्धन को. वह किस तरह की बचकानी बाते बोल रहे थे जिसे सुनकर हसी आ रही थी कि इन्हें हो क्या गया है. खैर..,

जब शपथ ग्रहण के लिए मेट्रो से अऱविंद केजरीवाल गए तो कई नेताओं ने यह भी कहा कि यह सिर्फ दिखावा है. कुछ का कहना था कि इससे आम जनता को परेशानी हो रही है. अब जब मंत्री सरकारी गाड़ी ले रहे है तो वही लोग हाय तौबा मचा रहे हैं. अगर ये सारे नेता पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करने लगे तो वे अपना और जनता दोनों का समय बर्बाद करेंगे.  समझदारी इसी में है कि उन्हें थोड़ा समय दिया जाए और अपने ढ़ंग से काम की आाजादी भी.

दिल्ली की जनता को भी इन बातों पर ध्यान ना देतें हुए सोचना चाहिए कि कम से कम पहले से कुछ तो बदलाव आ रहा है.  लोग अपनी शिकायतें और परेशानियों को लेकर खुद मुख्यमंत्री के घर तक पहुंच तो पा रहे हैं.  एक मुख्यमंत्री होने के नाते अरविंद केजरीवाल के पास सरकारी गाड़ी, सुरक्षा और घर तीनों चीजें ही होनी चाहिए. यह एक मुख्यमंत्री की जरूरत भी है और सरकार की जिम्मेदारी भी कि वह सीएम की सुरक्षा को एवही ना ले.


जनता और नेताओं को घर, गाड़ी से ऊपर उठकर सोचना चाहिए. इस तरह हाय तौबा मचाने से सरकार का समय भी बर्बाद हो रहा है और लोगों का भी . जितने समय में अब अफसर केजरीवाल के लिए छोटा घर बनाने और सर्च करने में लगेगा उस समय में वे लोगों की बेहतरी के लिए कुछ काम कर लेते.

Wednesday, October 30, 2013

सलमान खान से क्यों नाराज हैं उनके फैंस?

नई दिल्ली: बॉलीवुड के दबंग सलमान खान सोशल मीडिया पर ज्यादा एक्टिविटीज नहीं करते लेकिन जब बात उनके फैंस की हो तो फिर पीछे कैसे रहते.

जैसे ही सलमान को यह पता चला कि बिग बॉस शो को लेकर लोगों में उनके प्रति नाराजगी है तो उन्होंने अपने फैंस को ट्विट करके समझाने की कोशिश की.

सलमान खान को अपनी पलकों पर बिठाकर रखने वाले फैंस को क्या हो गया कि वे अचानक ही उनसे नाराज हो गए और ट्विट पर जमकर अपने हीरो की आलोचनाएं करने लगे. उनके फैंस का कहना था कि बिग बॉस का होस्ट होने के नाते सलमान खान को प्रतिभागियों को एक नजरिये से देखना चाहिए ना कि अपने व्यक्तिगत रिश्तों के आधार पर.

दरअसल, इस हफ्ते बिग बॉस में वीकेंड शो के दौरान सलमान खान बिग बॉस के घर की सदस्य तनीषा मुखर्जी का पक्ष लेते देखे गए. घर के अंदर लग्जरी बजट कार्य के दौरान तनीषा मुखर्जी और कुशाल टंडन में झगडा हुआ...इस दौरान तनीषा ने कुशाल पर हाथ भी उठाया..जबकि कुशाल चुपचाप वहां से चले गए. लेकिन बाद में कुशाल ने तनीषा को खूब बुरा भला कहा. और तनीषा चुपचाप सुनती रहीं.

हालांकि इस घर में इस तरह की हरकतें होती रहती हैं. लेकिन जब बात तनीषा की हुई तो सलमान चुप ना रह सके. अजय देवगन और काजोल सलमान के फैमिली फ्रेंड्स है.. शायद इस नाते सलमान ने तनीषा का पक्ष लिया हो.

बात चाहें जो भी हो लेकिन अपने हीरो को गलत साइड लेते हुए देख लोग का गुस्सा बाहर तो आना ही था. सलमान ने कुशाल को नसीहत देते हुए कहा कि वे इस तरह की बातें करते हुए बहुत ही बदतमीज लग रहे थे. घर से बाहर जाने के बाद अपने गलत छवि को सुधारना बहुत ही मुश्किल होगा कुशाल के लिए.

सलमान ने इस दौरान अपने व्यक्तिग अनुभवों का हवाला भी दिया कि उनकी एक दो गलतियों को वे आज तक सुधार नहीं पाए. सिर्फ इतना ही नहीं शो के दौरान सलमान इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने इस सीजन के बाद इस शो की मेजबानी ना करने की बात भी कह डाली.

सलमान पूरे शो में तनीषा के पक्ष में बोलते रहे. जब गौहर ने कुशाल के बारें में कुछ कहना चाहा तो सलमान ने उन्हें यह कहकर चुप करा दिया कि यह कुशाल और तनीषा का मामला है. सलमान का कहना था कि कुशाल को बोलने से पहले यह सोच लेना चाहिए कि वे किसके बारे में बोल रहे हैं. कुशाल ने जिस तरह बदतमीजी से बात की इससे लोगों में गलत मैसेज जा रहा है..जबकि सलमान ने तनीषा को कुछ नहीं कहा. घर में महिला सदस्यों से बात करने का यह पहला मामला नहीं है..इससे पहले अरमान कोहली भी काम्या पंजाबी को गालियां दे चुके है और उन्हें डिवोर्सी भी बुला चुके हैं.

इस बात पर सलमान ने कभी रिएक्ट नहीं किया. सलमान का कहना था कि अरमान ने काम्या का पैर पकड़कर माफी मांगी इसलिए उन्हें इस मामले में बोलने की जरूरत नहीं पड़ी.

सलमान का यह रवैया उनके फैंस को नागवार गुजरी है. फैंस ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया डाली.

बिग बॉस की एक दर्शक प्रीति दीक्षित ने लिखा कि पूरे एपिसोड में सलमान खान डायरेक्टली http://abpnews.newsbullet.in/movies/25-more/58230-2013-10-29-03-48-14तनीषा मुखर्जी का पक्ष लेते नजर आए. यह निराशाजनक है.

अंशिका ने लिखा, हमें पता है कि कुशाल टंडन गलत हैं...पर तनीषा की इतनी ज्यादा साइड लेकर सलमान अनफेय़र कर रहे हैं.

एक दर्शक ने तो यह भी लिखा है कि बिग बॉस में पहले दिन से ही अरमान कोहली महिला सदस्यों के प्रति अनादर करते दिख रहे हैं, लेकिन सलमान ने कुछ भी नहीं कहा है.

निमीता राय ने सलमान को ट्विट करके अपनी नाराजगी जताई और लिखा कि शो के दौरान सलमान पूरी तरह तनीषा की तरफदारी करते नजर आए...वो भी सिर्फ इसलिए कि तनीषा और अरमान सलमान खान के अच्छे फैमिली फ्रैंड्स हैं.

सलमान खान अपने फैंस को नाराज कैसे होने देते. उन्होंने भी ट्विटर के जरिए लोगों को समझाने की कोशिश की.सलमान ने यह भी लिखा,"यदि किसी महिला के साथ कोई बुरा व्यवहार करता है तो सभी महिला एवं पुरूषों को इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए. यदि ऐसा नहीं कर रहे हैं तो अब जरूर करना चाहिए." साथ ही सलमान ने यह भी कहा कि अगर वह सोशल मीडिया पर सिर्फ कुछ अच्छी तस्वीरों या फिर अपनी फीलिंग को शेयर करने के लिए आते हैं. लेकिन जब उन्होंने लोगों का मैसेज देखा तो लगा कि उन्हें रिप्लाई करना चाहिए.

अब हमें क्या पता सलमान कि आपने अचानक देखा और लोगों का जवाब दिया या फिर आप अपनी फैन फॉलोविंग को नाराज नहीं करना चाहते है. बात चाहें जो भी हो, सलमान खान को एक बात तो समझ आ गई होगी कि लोग तब तक ही पलकों पर बिठाते हैं जब तक उन्हें लगे कि आप अच्छे काम कर रहे हैं, नहीं तो लोग विलेन बनाने में देर नहीं लगाते.

Saturday, August 18, 2012

रिश्तों की कीमत हमेशा महिलाओं को ही क्यों चुकानी पड़ती है?


अपने देश में राजनेताओं के साथ महिलाओं के संबंध कोई नई बात नहीं है। बात नसीब-नसीब की है कि किसी-किसी के संबंध पर्दे के पीछे होते और खत्म हो जाते है और किसी का छीछालेदर होकर एनडी तिवारी की तरह बाहर आ जाता है।

इसी क्रम में एक और नाम जुडा- गोपाल कांडा, एक ऐसा नाम जिसने कुछ ही समय में एक जूते की दुकान से लेकर एयरलाइंस कंपनी के मालिक बनने और मंत्री तक का सफर तय कर लिया। कांडा के ही एयरलाइंस में एयरहोस्टेस रह चुकीं गीतिका शर्मा ने 4 अगस्त की देर रात अशोक विहार फेज-3 स्थित अपने फ्लैट में पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। 2 पेज के सुसाइड नोट में गीतिका ने गोपाल कांडा और उसी कंपनी की मैनेजर अरूणा चड्ढा पर मानसिक प्रताडना का आरोप लगाया है। यह पहली बार नहीं है जब कांडा पर आरोपी बने हैं। साल 2009 में अपने चुनावी शपथ पत्र में उन्होंने खुद बताया कि उनके खिलाफ क्राइम के 10 मामले चल रहे हैं। सुसाइड नोट के सार्वजनिक होने के कुछ ही घंटों बाद कांडा ने इस्तीफा दे दिया और कहा कि यह उनके खिलाफ कोई राजनैतिक षड्यंत्र का हिस्सा है।

इसके बाद शुरू हुआ दिल्ली पुलिस की छापेमारी। दिल्ली पुलिस की जिसने लगातार 12 दिनों तक कांडा के ठिकानों पर छापेमारी की लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। पुलिस पूरी तरह बेबस और लाचार दिख रही थी। पुलिस की परेशानी शायद कांडा से देखी नहीं गई और उन्होंने 12 दिनों तक फरार रहने के बाद आज बड़े ही नाटकीय तरीके से सरेंडर कर दिया।

अब इस सवाल का जवाब दिल्ली पुलिस ही दे सकती है कि वो कांड़ा को गिरफ्तार करना चाहती थी या फिर उसे समय दे रही थी ताकि कांडा बचने का सटीक तरीका ढ़ूढ़ ले। यह बात वाजिब है कि 12 दिन कम नहीं होते गवाहों को गुमराह करने के लिए या फिर उन्हें खरीदने के लिए। जिस तरह से कांडा ने सरेंडर किया है उससे यह तो साफ हो गया है कि यह पूरा माजरा स्क्रिप्टेड है।

गौऱ करने योग्य बात है कि कांडा ने गीतिका शर्मा को 17 साल की उम्र में 2006 में ही एमडीएलआर एयरलाइंस में 16 हजार रुपए वेतन पर फ्लाइट अटेंडेंट की नौकरी दी।  जिस एयरलाइंस की शुरूआत ही 2007 में की हुई उसमें गीतिका को नौकरी एक साल पहले ही मिल गई थी। जब एक साल के अंदर ही गीतिका ने नौकरी छोडऩी चाही तो उसका वेतन बढ़ाकर 33000 कर दिया गया।

2010 में गीतिका के जॉब छोड़ दिया तो कुछ दिन बाद गोपाल कांडा ने उसे दोबारा अपनी कंपनी में नौकरी दे दी, वह भी प्रमोशन देते हुए कंपनी का निदेशक बनाकर। 66000 रुपए वेतन तय हुआ और कंपनी की ओर से बीएमडब्ल्यू कार। इतना ही नहीं, गीतिका के एग्रीमेंट में यह भी था कि रोज शाम को वह गोपाल कांडा को रिपोर्ट किये बिना घर नहीं जा सकती।

आखिर, गोपाल कांडा ने गीतिका पर इतनी मेहरबानी क्यों की? एक नाबालिग लड़की को नौकरी कैसे दे दी गई? आखिर ऐसा क्या कर दिया गीतिका ने जो पहली बार में ही उसका इनक्रीमेंट सीधे सौ फीसदी से ज्यादा कर दिया गया?
क्या गीतिका का अनुभव इतना गजब का था कि उसे प्रेसिडेंट का ओहदा दे दिया गया? क्या गीतिका के परिवार जनों को इसकी कोई खबर नहीं थी? मेरे मन में ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब शायद किसी के पास नहीं है।

आज गीतिका का परिवार जस्टिस के लिए गुहार लगा रहा है लेकिन क्या इससे पहले गीतिका की परेशानियां उन्हें नजर नहीं आई।  इतने कम समय में इतना सब कुछ! आखिर गीतिका के परिवार को यह नागवार क्यों नहीं लगा कि गोपाल कांडा उस पर इतने मेहरबान क्यों है? या फिर उसकी इतनी जल्दी-जल्दी तरक्की क्यों और कैसे हो रही है? आखिर उन्हें यह तो पता ही था कि उनकी बेटी असाधारण प्ततिभा की धनी तो है नहीं। उन्होंने तरक्खी से खुश होने के बजाय यह पता लगाने की कोशिश क्यों नहीं कि सबकुछ इतनी जल्दी क्यों हो रहा है या फिर वो जानबूझ कर अंजान बन रहे थे।

खैर, अब तक महिलाओं के आत्महत्या या हत्या के मामलों पर नजर डाला जाए तो उनमें से ज्यादातर कम समय में शोहरत और धन बटोरने की के लालच की शिकार होती हैं। चाहें हम बात मधुमिता, लैला खान की करें या फिजा या फिर भंवरी देवी की। सब की मौत का कारण बना दौलत और शोहरत।

कहा जाता है कि महात्वाकांक्षी होना अच्छी बात है। लेकिन ऐसी महात्वाकांक्षा का क्या फायदा जिसकी बदले में अपनी जान गवांनी पड़े। लेकिन आजकल तो कर्मवादी बनने की बजाय शार्ट कट का चलन है। तो उसका कुछ ना कुछ खामियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा।

Monday, June 04, 2012

उल्टे चोर कोतवाल को डांटे...

किसी ने सही कहा है कि सत्य वचन कहने के लिए भी कलेजा चाहिए.., अगर कलेजा नहीं फिर तो भइया लग गई आपकी..!!

अब उदाहरण के तौर पर आमिर खान को ही देख लीजिए..जैसे ही उन्होंने सत्यमेव जयते में 'स्वास्थ्य और डॉक्टर्स' से संबधित प्रोग्राम पेश किया तो डॉक्टर तो उनके पीछे ही पड़ गए। 

आपको बतातें चलें कि इस शो में आमिर ने यह बताने की कोशिश की थी कि किस तरह डॉक्टर अपने पेशे को बदनाम कर रहे हैं। ऐसे कई उदाहरण पेश किए गए जिनमें स्वास्थ्य सेवाओं में हो रही धांधलियाँ को दिखाया गया। किस तरह आंध्र प्रदेश के एक गाँव में बड़ी संख्या में महिलाओं की बच्चादानी यानी गर्भाशय निकाल दिया गया, जबकि इसकी कोई जरुरत ही नहीं थी। उन महिलाओं से बातचीत करने पर यह पता चला कि ‘उन्हें बताया गया था कि अगर उन्होंने ऑपरेशन नहीं करवाया तो उनकी जान चली जाएगी।

इतना ही नहीं, यह भी बताया गया कि डॉक्टर किस तरह जबरन ऑपरेशन कर देते है..गलत दवाईंया लिख देते हैं और अगर कुछ बीमारी ना भी हो तो सिर्फ कमीशन कमाने के चक्कर में बेवजह ब्लड चेकअप वगैरह लिख देते है। यह सब जानने के बावजूद भी किसी भी डॉक्टर पर ना ही कोई कार्यवाही होता है और ना ही उनका लाइसेंस रद्द किया जाता है। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार भारत में 2008 से अब तक किसी भी डॉक्टर के लाइसेंस स्थाई रुप से रद्द नहीं किए गए हैं। जबकि अन्य देशों में हर साल ऐसे डॉक्टर्स को सजा के फलस्वरूप उनके लाइसेंस स्थाई रूप से रद्द कर दिए जाते है। खैर कोई बात नहीं...शायद हमारे देश के डॉक्टर्स इतने महान है कि उन्हें हटाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

हालांकि, इस शो आमिर ने कहीं भी यह नहीं कहा कि हमारे देश के सारे डॉक्टर ऐसे है उनका कहना सिर्फ इतना था कि क्या हमारे समाज में भगवान का दर्जा पाने वालो डॉक्टर्स की यह हरकत कर रहे हैं क्या वह सही है? क्या उन्हें यह हक है कि वह किसी की जान बेवजह ही छीन लें?

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि डॉक्टरों तथा मेडिकल कॉलेजों पर निगरानी रखने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एमसीआई) के प्रमुख केके तलवार ने शो में साफ-साफ स्वीकार किया कि स्वास्थ्य विभाग में ये सारी गड़बड़ियाँ मौजूद है और जल्द ही इनके लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। अब तो आप अंदाजा लगा सकते है कि जिस गंगा की गंगोत्री ऐसी है उसकी हालत क्या होगी।

अब...आईएमए के डॉक्टर्स ने मेडिकल समुदाय के प्रति 'गलत संदेश' भेजने के लिए आमिर से माफी की मांग की है। सोचने वाली बात तो यह है कि शो देखने के बाद कहां तक डॉक्टर मांफी मांगते और यह संदेश देते कि वह इसके सुधार में कदम उठांएगे ताकि लोग उनपर भरोसा रखें... बजाय इसके ये तो गलती बताने वाले पर ही बरस पडे।

फिर सवाल यह उठने लगा कि आमिर खान ने डॉक्टरों पर गलत काम करने का आरोप क्यों लगाया?...जब कि सभी डॉक्टर गलत नहीं होते!...यह डॉक्टरी पेशे का अपमान है, और इसके लिए आमिर खान को चाहिए कि वह ' माफी' मांगे!  लेकिन मुझे लगता है कि आमिर कहीं से भी गलत नहीं है वह सिर्फ एक माध्यम है जो हमें यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारे समाज में, देश में, क्या हो रहा है..उस पर अमल करना या फिर ना करना हमारा काम है।

इस शो की शुरूआत हुई तो बहुत सारी बातें लोगों ने कही..। कुछ लोगों ने जमकर आलोचना की..कि आमिर इसमें नया क्या कर रहे हैं? उन्हें तीन  करोड़  लेकर ही समाज की बुराइयों से पर्दा उठाना था..ये काम वह पहले भी कर सकते थे..लेकिन अब क्युं? क्योंकि अब आमिर को इसके लिए इतनी मोटी रकम मिल रही है जो अभी तक ना किसी को मिली है और न ही कभी ऑफर की गई है।

मेरा कहना ये है कि हमारे देश में 'पैर पीछे खींचने' की आदत बहुत पुरानी है तो इनसब बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। हमसब को उनका साथ देना चाहिए जिससे कि हमारे समाज से कुछ ही सही बुराईयां खत्म तो हों..!!

Monday, July 11, 2011

'We hate love stories...'

'खाप पंचायत में प्रेमी जोड़े की हत्या का ऐलान',
प्रतिष्ठा बचाने के लिए किया बेटी का कत्ल,
खाप पंचायत का तुगलकी फरमान जारी, शादी-शुदा को दिया भाई-बहन बनने का आदेश.

ऐसी खबरें आए दिन सुनने को मिल जाती हैं. कई बार तो खाप पंचायत के फैसले मानवता को झकझोर कर रख देने वाले होते हैं. सामाजिक प्रशासन प्रणाली से जु़डी खाप पंचायतें, जो खासकर हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रचलित हैं, सगोत्रीय विवाह और प्रेम विवाह की कड़ी विरोधी हैं. और इनके फैसले की नारफरमानी करने वालों को कई बार अपनी जान तक गंवानी पड़ती है.


दरअसल,. लेकिन, इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि समय के बदलने के साथ साथ इन खाप पंचायतों के मायने भी बदल गए. शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में विकास एवं प्रगति के नए मापदंड स्थापित होने लगे. शहरी व ग्रामीण लोगों के रहन-सहन, खान-पान में बदलाव तो आया, परंतु ठीक इसके विपरीत पंचायत तथा खापों में कोई कोई आधुनिक सोच पैदा नहीं हुई, ना ही कोई बदलाव आया. बजाय इसके ये पंचायतें तालिबानी रास्ते पर चलती नजर आने लगीं.


गांव में आमतौर पर युवा वर्ग तथा महिलाएं गांव के बड़े-बुजुर्गों की पूरी इज्‍जत करते हैं. लेकिन शायद बुजुर्ग इस सम्मान को सम्मान या आदर न समझकर यह समझ लेते हैं कि गांव का युवा वर्ग और महिलाएं उनसे डरते व भय खाते हैं इसलिए सम्मान देते हैं. शायद पंचायतों के बुजुर्गों की यही सोच उन्हें अपने दक़ियानूसी सोच से अलग होने नहीं देती. तभी यह खाप पंचायत के सरगना हुक्के क़ी गुड़गुड़ाहट और धुएं के बीच ऐसे फैसले सुना डालते हैं जो दूर तक किसी वास्तविक मुजरिम के विरुद्ध सुनाने योग्य भी नहीं होते.


इन पंचायतों द्वारा ऐसे कई फैसले दिए जा चुके हैं, जिससे ना केवल समाज में खलबली पैदा होती है बल्कि न्यायपालिका, शासन व प्रशासन भी इसके सामने लाचार नजर आने लगता है. हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पंचायतों नजर में एक समान गोत्र में विवाह करना तो सबसे बड़ा अपराध माना जाता है. हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे कई प्रेमी जोड़े जिन्होंने अपने गांव के हुक्का गुड़गुड़ाने वाले पंचायतों के भय की अनदेखी कर विवाह रचाने का ‘दु:साहस’ किया तो सिर्फ उन्हें ही नहीं उनके साथ साथ उनके परिजनों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है.


इन पंचायतों व खापों के भटकाव का दरअसल एक कारण यह है कि इन पंचायतों में आज भी परंपरावादी, अनपढ़, दबंग, जिद्दी तथा दूसरों की बातों को पूरी तरह अनसुनी करने की जहनियत रखने वाले लोग ही हावी हैं. जो अपनी सोच को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते और सिर्फ अपन  बातों पर ही टिके रहना चाहते है भले ही अपने जिद की कीमत किसी की मौत ही क्यों ना हो.


पहली बार बालीवुड ने खाप पंचायत पर फिल्म बनाने का मन बनाया है. इस फिल्म के जरिए अब खाप पंचायतों की मनमानी और उनके तुगलकी फैसले पर्दे पर भी नजर आएगा. फिल्म खाप के आदेशों पर ऑनर किलिंग पर आधारित है. खाप फिल्म में उस दुनिया की कहानी है, जिसमें पुराने रीति रिवाजों को तोड़ने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. 29 जुलाई को रिलीज होने जा रही इस फिल्म में मुख्य भूमिका ओम पुरी और नवोदित अभिनेत्री युविका चौधरी ने निभाई है.


लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ फिल्म भर बन जाने से इन पंचायतों की मानसिकता पर कोई फर्क पड़ेगा? क्या इनकी अमानवीय हरकतों और फैसलों में कोई बदलाव आएगा. कोर्ट के बार-बार दिशा-निर्देश के बाद भी पंचायतों के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है. ज़ाहिर है कि पंचायत के लिए कोर्ट का आदेश कोई मायने नहीं रखता. क्योंकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन पंचायतों के फैसलों पर प्रतिबंध लगा चुकी है, उच्चतम न्यायालय ने खाप पंचायतों को गैर कानूनी भी घोषित कर दिया है और यह कहा है कि झूठी शान के नाम पर युवाओं की हत्या अमानवीय है. लेकिन फिर भी इन पर कोई असर दिखाई नहीं दे रहा.


अभी से ही हरियाणा के जोटो ने इस फिल्म का विरोध करना शुरू कर दिया है. अखिल भारतीय जाट महासभा का कहना है, 'फिल्म में सर्व खापों को तालिबानी दिखाया गया है. खापों ने हमेशा समाज और देश हित में फैसले लिए हैं. हमारी पूरी कोशिश होगी की पूरे देश में फिल्म रिलीज न हो.' यह सुनकर तो सिर्फ ऐसा लगता है कि काश! ऐसा होता. काश! खाप पंचायतों ने हमेशा समाज और देश हित में फैसले लिए होते तो आज उनकी अस्तित्व बचाने की बात हम ना कर रहे होते. कितना अच्छा होता कि  अगर ए पंचायत हमारी न्याय व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय सही फैसले देकर न्याय व्यवस्था की सहायता कर रहे होते. खैर....



सही मायने में देखें तो पंचायत का रूप और मायने अब दोनों ही बदल गए हैं. जिस मकसद से इनको बनाया गया था वह तो अब इनके दायरे में भी नहीं आता. इन पंचायतो का काम सिर्फ अमानवीय फैसले सुनाना, किसी को मौत के घाट उतार देने तक सीमित होकर रह गया है. अब इनका अस्तित्व खतरें में है. पंचायतों को आज के युग में अगर अपनी विश्वसनीयता, लोकप्रियता, दबदबा तथा मान मर्यादा कायम रखनी है तो उन्हें सबसे पहले अपने पूर्वाग्रहों तथा परंपरावादी दक़ियानूसी विचारों से ऊपर उठना होगा. पंचायतें अगर अपने खोए हुए अस्तित्व को पाना चाहती हैं, अगर वह अपने लगातार खोते जा रहे सम्मान, इज्जत को दूबारा लाना चाहती हैं तो उन्हें अमानवीय फैसले सुनाने के बजाए ऐसे फैसले सुनाने चाहिए जिनसे समाज व देश का कुछ कल्याण हो सके. इन्हें हमारे देश की न्याय व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय अपने में बदलाव लाते हुए न्यायपालिका की सहायता करनी चाहिए.

Wednesday, July 06, 2011

बचेगी लाज या लूटेगी लाज ?


आज भी बलात्कार के मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों में यह दलील पेश की जाती है कि बलात्कार की वजह लड़की या महिला के छोटे छोटे और भड़काऊ कपड़े हैं. लेकिन शायद दलील देने वालो को यह भी पता होना चाहिए कि बलात्कार सिर्फ उन्हीं लड़कियों या महिलाओं के साथ नहीं होता है जो छोटे कपड़े पहनती है बल्कि साड़ी, सलवार सूट पहनने वालों के साथ भी होता है. यह जरूरी नहीं है कि जब कोई लड़की भड़काऊ कपड़े पहन रही है या सेक्सी लग रही है तो वह किसी को सेक्स के लिए आमंत्रित कर रही हैं या फिर पुरूष इसे देखकर अपने आप पर काबू ना कर पाये.
अहम सवाल यह है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले पुरूष का चरित्र इतना कमजोर क्यों है कि वह इस हद तक गिर जाता है. वह यह भूल जाता है कि उसकी नैतिक जिम्मेदारियां क्या हैं? उसकी संस्कृति क्या है? ऐसे में नैतिकता और संस्कृति की जिम्मेदारियां महिलाओं के सिर पर ही क्यों गढ़ दी जाती हैं? और अपनी बेशर्मी और दरिंदगी को छुपाने के लिए वह यह कहने से भी बाज नहीं आता कि यह भड़काऊ कपड़ो की वजह से हो गया. भड़काऊ कपड़ो की बात तब कहां चली जाती है जब आये दिन यह मामला सामने आता है कि 4साल की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ. मासूम बच्ची तो भड़काऊ पहनावे के साथ किसी को आमंत्रित करने नहीं जाती.


24 जनवरी 2011 को टोरंटो में ऐसे ही एक महिलाओं के भावनाओं को आहत करने वाली और उनकी स्वतंत्रता पर ही लगाम लगाने वाली एक घटना सामने आई. एक पुलिस अधिकारी ने महिलाओं को सलाह दी, “महिलाओं को अपने साथ होने वाले यौन उत्पीड़न से बचने के लिए स्लट की तरह कपड़े नहीं पहनने चाहिए.” इस बात का वहां की महिलाओं ने जमकर विरोध किया. इसके खिलाफ महिलाओं ने एक वॉक किया जिसका नाम स्लट वॉक दिया गया. लेकिन यह वॉक सिर्फ टोरंटो में ही नहीं बल्कि ऑस्‍ट्रेलिया के मेलबर्न के अलावा मानिट्रयल, कार्डिफ, एडिनरा, न्यूकसैल और ग्लासगो जैसे दुनिया के कई शहरों में भी महिलाओं ने निकाला.

महिलाओं के खिलाफ रेप जैसे संगीन अपराधों के विरोध में दुनिया भर में तेजी से मशहूर हो रहा स्लटवॉक आंदोलन अब भारत में भी दस्तक दे चुका है. अब भारत में पहली बार स्लटवॉक भारत में बेशर्मी मोर्चा के नाम से होने जा रहा है. इस अनोखे विरोध प्रदर्शन के आयोजकों का मानना है कि यहां पर लोग स्लट (वेश्या) से गलत मतलब समझेंगे और क्‍योंकि अंग्रेजी शब्द होने के वजह से कुछ लोग इसे समझ ही नहीं पायेंगे इसलिए इसे 'बेशर्मी मोर्चा' का नाम दिया गया.

हालांकि, भारत में इसके नाम को लेकर भी जमकर बहस चल रही है. कुछ लड़कियों का कहना है कि जब हम अपने सम्मान के लिए लड़ रहे हैं तो फिर गलत नाम क्यों लिया जाए. जबकि कुछ की नजर में यह नाम उपयुक्‍त है. किसी के कपड़े पहनने का तरीका खुले विचार और लाइफ स्टाइल से कोई स्लट नहीं बन जाता.
इतिहास गवाह है जब सहनशीलता अपनी चरम सीमा पर होती है तो विरोध के स्वर उठते हैं. और विरोध के तरी के ऐसा रूप तब ही अख्तियार करते है जब किसी चीज की हद हो जाती है . नारी की सहमशक्ति की सीमाएं जब टूटती है तो वह ऐसा ही प्रचंड रूप धारण करती है. भारत में हो रहे इस स्लटवॉक का संदेश उन स्त्रियों के लिए है जो चुपचाप अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और बलात्कार जैसे घटनाओं को सहती रहती है और घूटकर जीने को मजबूर कर दी जाती हैं.

दिल्ली में इसकी शुरूआत दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा उमंग सभरवाल ने किया है. सभरवाल ने दोस्तों के साथ मिलकर फेसबुक पर स्लटवॉक दिल्ली 2011 का पेज बनाया. जिसमें कहा गया है कि जब भी महिलाओं के साथ ऐसी कोई घटना होती है तो उस पीड़ित लड़की या महिला में ही खांमिया ढ़ूढ़ा जाता है. जैसे रात को बाहर क्यों गई? छोटे कपड़े क्यों पहने? इसी मानसिकता को बदलने के लिए यह वॉक किया जायेगा.

इस वॉक के लिए दिल्ली में 25 जून का दिन तय किया गया था लेकिन अब यह 24 जुलाई को कनॉट प्लेस में होगा. चुकि इसे फेशबुक पर जोर शोर से सपोर्ट मिल रहा है इसलिए आयोजक इसकी सफलता को लेकर चिंतित नहीं है. इसे सिर्फ लड़कियों का ही नहीं बल्कि लड़को का भी सपोर्ट मिल रहा है.

उमंग सभरवाल का कहना है, “भारत में जो लड़किया परंपरागत नियमों में नहीं बंध कर रहना चाहतीं सबसे पहले उन्हें बेशर्मी की दुहाई दी जाती है. उनको बेशर्म चरित्रहीन, कूल्टा आदि कहा जाता है. हम इसी दोहरी मानसिकता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, जो लड़कियों की सुरक्षा का हवाला देकर पुरूषों के गलत व्यवहार को बढ़ावा देते हैं. लड़का हो या लड़की, सबकी सेक्सुएलिटी का समान तरीके सम्मान करना चाहिए. किसी लड़की को उसके कपड़ो के लिए शर्मसार कैसे कर सकते हैं. इसी बेशर्मी के खिलाफ यह मोर्चा है.”

एक सवाल पर कि क्या यहां भी और देशो की तरह छोटे कपड़े पहनकर ही प्रदर्शन किया जायेगा, पर सभरवाल ने बताया कि यह मोर्चा टोरंटो स्लटवाक से प्रेरित जरूर है लेकिन इसका प्रारूप भारत की संस्कृति और सभ्यता को ध्यान में रखकर ही तैयार किया जा रहा है. यह कोई अंग प्रदर्शन की परेड नहीं है ना ही हम अंग प्रदर्शन को बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि इस वाक में लड़किया जिन कपड़ो में सहज महसूस करती है उसमें आ सकती हैं. वह शार्टस हों या सलवार कमीज या फिर जींस-टाप. यह मुद्दा कपड़ो का नहीं है. भारत में महिलाएं दूसरे देशों की तरह छोटे और तंग कपड़ों में नहीं बल्कि 'सही कपड़ों' में स्लटवॉक करेंगी.

इस संदर्भ में कुछ लोगों का कहना है कि पता नहीं भारतीय समाज में यह मोर्चा सही संदेश दे पायेगा या नहीं. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इसको पूरे जोर शोर के साथ विरोध कर रहे हैं. तो कोई तो यह भी कहने से हिचक रहा कि इससे तो बलात्कार के मामले बढ़ेंगे ही. लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या बेशर्म पुरूष को रत्ती भर भी अपनी इस करनी का एहसास होगा? कहीं महिलाएं एक मजाक बनकर तो नहीं रह जायेंगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह पश्चिमी सभ्यता को बढ़ावा दे और हमारी सभ्यता एक इसमें कहीं ओझल हो जाये. ऐसा ना हो विरोध के इस तरीका अपने मूल मूद्दे से भटक जाये और यह पुरूषों के लिए शोषण की नई परिभाषा पेश कर दे.

अंबिका रॉय, छात्रा
"इस वॉक से लोगों की मानसिकता पर कुछ खास असर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि अभी तो ये शुरूआती दौर है. इस पर बहस काफी दिनों से चल रही है. यह सिर्फ एक औरत के अस्मत की बात ही नहीं है. अब यह मुद्दा दोनों सेक्स के बीच की लड़ाई हो गई है. मूलत: यह पुरूष और औरत के अहम की लड़ाई है. इससे लोगों की मानसिकता पर शायद ही कोई असर पड़े. हां, इतना जरूर है कि यह लोगों को इस समस्या की तरफ आकर्षित जरूर करेगा.”

संगीता तोमर, मीडियाकर्मी
"कपड़े के आधार पर हम किसी के चरित्र को नहीं माप सकते. हमें अपना जीवन, पहनावा खान-पान चुननेकी स्वतंत्रता है. कपड़ा हर इंसान वही पहनता है जिसमें वह सहज महसूस करता है. बदलते समय के साथ लड़कियों का पहनावा भी बदला है परंतु बलात्कार की समस्या ना तो बदली हैं और ना ही नई है. तो फिर क्यों किसी लड़की के बलात्कार होने पर उसके पहनावे को निशाना बनाया जाता है जबकि बलात्कार तो तब भी होते थे जब महिलाएं पूरे कपड़े पहनती थी.”