Friday, February 16, 2018

मूवी रिव्यू: नीरज पांडे की 'अय्यारी' में दम नहीं है



स्टार कास्ट: मनोज बाजपेयी, सिद्धार्थ मल्होत्रा, रकुल प्रीत सिंह, कुमुद मिश्रा, नसीरूद्दीन शाह, आदिल हुसैन
डायरेक्टर: नीरज पांडे
रेटिंग: 2.5 स्टार

आपको गूगल करने की जरूरत नहीं सबसे पहले आपको 'अय्यारी' का मतलब बता देते हैं. अय्यारी शब्द अय्यार सेे बना है. अलग-अलग रूप बदल ले उसे 'अय्यार' कहते हैं. इस फिल्म के डायरेक्टर नीरज पांडे हैं जिन्होंने इससे पहले 'ए वेडनेसडे', 'बेबी' और 'स्पेशल 26' जैसी फिल्में बनाई हैं. ये फिल्म अगर आपने देखीं हों तो जरूर पता होगा कि इन्हें क्यों इतना पसंद किया गया. जबरदस्त कहानी, दमदार एक्टिंग, सस्पेंस और आखिर में लोगों के लिए एक महत्वूपर्ण मैसेज ने इन फिल्मों को अब तक की शानदार फिल्मों में से एक बना दिया. लेकिन नीरज की 'अय्यारी' में वो बात नहीं जो उन फिल्मों में थी.

कहानी

वैसे तो फिल्म की कहानी ऐसी है कि कहां आ रही है और कहां जा रही समझ नहीं आता. फिर भी आपको बता देते हैं. कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) और मेजर जय बख्शी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) दोनों आर्मी की सीक्रेट यूनिट के लिए काम करते हैं. अचानक जय बख्शी गायब हो जाता है और वो कुछ सूचनाएं लीक करने लगता है जिसकी वजह से अभय उसे 'गद्दार' मानता है. फिर ये कहानी दिल्ली से होते हुए लंदन तक पहुंच जाती है.

इस बीच आर्म्स डील में किस तरह घोटाले होते हैं, कश्मीर के मुद्दे पर कैसे सबकी दुकानें चल रही हैं जैसी बहुत सारी छोटी-छोटी कहानियां देखने को मिलती हैं. बीच में कॉमन मैन नसीरूद्दीन शाह की भी एंट्री होती है और उनके जरिए सस्पेंस क्रिएट किया जाता है. आर्म्स डीलर जो कि चार गुना कीमत पर हथियार बेचता है वो कैसे आर्मी चीफ को ब्लैकमेल करता है ये दिखाया जाता है. आखिर जय बख्शी वाकई गद्दार है? क्या अभय आर्मी चीफ को ब्लैकमेलिंग से बचा पाता है? इस फिल्म में कॉमन मैन का क्या कनेक्शन है? ये सब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.

एक्टिंग

जिस फिल्म में इंडस्ट्री के सारे दिग्गज एक्टर हो उसमें एक्टिंग की क्या बात करें. कश्मीर, करप्शन और देश तो ऐसा मुद्दा है कि जिस पर ठीक-ठाक भी कहानी हो तो लोगों में देशभक्ति जग जाती है. लेकिन यहां ऐसा नहीं हो पाता. नसीरूद्दीन शाह को देखकर 'ए वेडनेसडे' की याद आ जाती है जिसमें कॉमन मैन सब कुछ हिलाकर रख देता है लेकिन यहां वो भी फीके पड़ गए हैं.

इस फिल्म में अगर कुछ देखने लायक है तो वो हैं मनोज बाजपेयी. उनका हर एक सीन दमदार है. वहीं सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अच्छी एक्टिंग की है. वो फिल्म में कई अलग-अलग रूप में दिखे हैं. हालांकि फिर भी कुछ खास असर नहीं छोड़ पाते हैं. 2015 में आई 'ब्रदर्स' के बाद सिद्धार्थ की फिल्में लगातार फ्लॉप हो रही हैं. 'बार-बार देखो', 'ए जेंटलमैन' और 'इत्तेफाक' इससे पहले कुछ खास नहीं कर पाई है और इस फिल्म को देखकर भी नहीं लगता कि  कुछ खास होने वाला है. अब सिद्धार्थ के लिए ये चुनौती भरा समय है कि फिल्मों के चुनाव पर ध्यान दें.



फिल्म में फीमेल एक्टर्स की बात करें तो रकुल प्रीत सिंह इस फिल्म में क्यों हैं ये शायद मेकर्स को भी नहीं पता. जरूरी नहीं है कि फिल्म बन रही हो तो उसमें जबरदस्ती लव एंगल डाल दिया जाए. यहां ऐसा ही हुआ है. कुछ एक सीन में वो दिखी हैं. एक गाना भी उनपर फिल्माया गया है जो ठीक ठाक है. वहीं मनोज बाजयेपी की पत्नी की भूमिका में पूजा चोपड़ा के भी एक, दो सीन ही हैं.

डायरेक्शन

नीरज पांडे अपनी फिल्मों में सस्पेंस बरकरार रखने में कामयाब रहते हैं. इस फिल्म को देखते वक्त भी दिमाग में यही रहता है कि कुछ तो ऐसा होगा जो असरदार होगा. इस फिल्म में सस्पेंस तो बरकरार रह जाता है लेकिन बाद में कुछ नहीं मिलता. डिफेंस डील को लेकर जो कहानी हम दो घंटे तक देखते हैं आखिर में वो एक बिल्डिंग पर आकर खत्म हो जाती है. ऐसा लगता है कि इतने बड़े-बड़े मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने वाली ये फिल्म एक छोटी सी बात को भी अच्छे से नहीं दिखा पाती.

कमियां

स्क्रिप्ट बहुत ढीली है. फिल्म बहुत ज्यादा  लंबी है. कहानी भटकी हुई है.  पता नहीं नीरज पांडे क्या दिखाना चाहते थे और क्या दिखाया है. वो डिफेंस डील में घोटाला दिखान चाहते थे, वो कश्मीर के मुद्दे को भुनाना चाहते थे या फिर आर्मी में चल रही दिक्कतों से रू-ब-रू कराना चाहते थे. बहुत कन्फ्यूजन दिखाई देती है. उसी में लव स्टोरी भी जबरदस्ती डाल दी गई है. इतने गंभीर मुद्दे पर चल रही फिल्म में जब अचानक लव एंगल आता है तो भटकाव वहीं से शुरू हो जाता है और फिल्म खत्म होते-होते बोझिल बन जाती है.

क्यों देखें/ना देखें

इस फिल्म में कई बड़ें मुद्दों पर बात की गई गई है और यही वजह है कि ये अपनी किसी भी बात को अच्छे से बयां नहीं कर पाती है. ऐसा लगता है कि हम टुकड़ों में फिल्म देख रहे हैं. आर्म्स डील में हो रहे घोटाले को लेकर बनी ये फिल्म क्लाइमैक्स में फुस्स निकलती है. दमदार एक्टर्स की भरमार होते हुए ये भी इसे देखने के बाद ना तो कोई डायलॉग याद रह पाता है और ना ही कोई सीन. अगर आप नीरज पांडे की फिल्मों के फैन हैं तो ये फिल्म आपको बहुत बोर करेगी. हां, ये आप मनोज बाजपेयी के लिए देखना चाहें तो कुछ और बात है.

Sunday, February 11, 2018

Padman Movie Review

स्टार कास्ट: अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर

डायरेक्टर: आर. बाल्की

रेटिंग: ****

सैनेटरी पैड और पीरियड जैसे मुद्दे पर तो लोग बात तक नहीं करना चाहते. अबतक हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक किसी भी बड़े स्टार ने इस विषय पर फिल्म बनाने की बात सोची तक नहीं लेकिन ये हिम्मत अक्षय कुमार ने दिखाई. एक बड़े स्टार के लिए ऐसा विषय चुनना बहुत मुश्किल है जिसका नाम लेते ही लोग नज़रें चुराने लगते हैं. जब लोग देखेंगे और सुनेंगे ही नहीं तो समझेंगे कैसे. लेकिन इस फिल्म के जरिए अक्षय कुमार अपनी बात दर्शकों तक आसान भाषा में पहुंचाने में कामयाब रहे हैं. पिछले साल इसी विषय पर 'फुल्लू' फिल्म आई थी लेकिन शायद ही आपने उस बारे में सुना भी हो. 'पैडमैन' के आने से पहले इसे लेकर दो डर थे- पहला कि कहीं ये बहुत फिल्मी ना हो जाए और दूसरा कि कहीं इसे डॉक्यूमेंट्री जैसी ना बना दें. लेकिन फिल्म देखने के बाद ये कहा जा सकता कि ये फिल्म गेम चेंजर भी साबित होने वाली है क्योंकि इसके बाद पीरियड्स और सैनेटरी पैड जैसे शब्दों को लेकर लोगों की राय बदलने वाली है.

ये फिल्म तमिलनाडु के रहने वाले अरूणाचलम मुरूगनाथम के ऊपर बनी है जिन्होंने सैनिटरी पैड बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया. इनकी कहानी को अक्षय की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने अपनी किताब में लिखी उसके बाद इस पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें राजी किया. यहां पढ़ें असली पैडमैन की पूरी कहानी

कहानी

ये फिल्म मध्य प्रदेश के बैकग्राउंड में बनी है. इसमें साल 2001 के दौरान की कहानी दिखाई गई है. लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी से बेइंतहा मोहब्बत करता है. लोग प्यार से उसे लक्ष्मी बुलाते हैं. जैसे ही पता चलता है कि उसकी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) अपने पीरियड्स (माहवारी) के दौरान गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती है तब वे इस बात को लेकर परेशान हो जाता है. गंदगी से कई बड़ी बीमारियां फैलती हैं और उसे इस बात की फिक्र है कि गायत्री को कुछ हो न जाए. फिर लक्ष्मी गायत्री को सैनेटरी पैड लाकर देता है लेकिन कीमत देखकर पत्नी इसे इस्तेमाल करने से मना कर देती है.

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इसके बाद लक्ष्मी को आइडिया आता है कि इसे कम लागत में भी बनाया जा सकता है. बार-बार कोशिश करने पर भी वे वैसा पैड नहीं बना पाता जो कंपनियां बनाती हैं. फिर वे सैनेटरी पैड की मशीन बनाने की ठान लेता है. लेकिन इसके लिए उसे बड़ी कुर्बानी देनी पड़ती है. पत्नी, मां, बहन और समाज हर कोई उसके अस्तित्व को ही नकार देता है. लोगों को लक्ष्मी माहवारी की तरह ही 'गंदगी' लगने लगता है. IIT से आविष्कार के लिए अवॉर्ड जीतने पर लोग उसकी तस्वीर देखकर खुश तो होते हैं लेकिन अगले ही पल जब देखते हैं कि ये सम्मान पैड के लिए मिला है तब उसे दुत्कारते भी हैं और लानत भरी नज़रों से देखते हैं.

लेकिन वो हौसला नहीं हारता और लगातार डटा रहता है. इसके बाद अचानक उसकी ज़िंदगी में परी (सोनम कपूर) की एंट्री होती है और वो उसकी प्रेरणा बन जाती है. पैड के इस्तेमाल जैसी जिस छोटी सी बात को लक्ष्मी औरतों को नहीं समझा पाता वो परी चुटकियों में कर देती है और फिर जो सिलसिला चलता है वो थमने का नाम नहीं लेता है. लेकिन अब भी उसका परिवार उसे गलत ही मानता है. उसे यूएन (यूनाइटेड नेशंस) में स्पीच देने के लिए बुलाया जाता और वहां पर लक्ष्मी जो बोलता है वो बातें सुनने वालों के दिल में उतर जाती हैं. लक्ष्मी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहता है- 'जब आपकी मां, बहन और बेटी मजबूत होती हैं तब देश मजबूत होता है.' ये एक लाइन बहुत बड़ा संदेश देती है.

 


हमारी सोसाइटी में आज भी पीरियड के दौरान महिलाओं को जिस हालात से गुजरना पड़ता है वो किसी से छिपा नहीं है. पीरियड आने पर घर के किसी कोने में पड़े रहना, अलग बिस्तर पर सोना, पति को ना छूना और खाना ना बनाना, बड़ों को खाना-पानी ना देना... इस तरह के जो भ्रम हैं ये हुबहू वही दिखाती है और फिर बताती है कि अब उससे बाहन निकलने का समय आ गया है.

एक्टिंग

अक्षय कुमार ने पैडमैन की भूमिका को बहुत ही सहजता ने निभाया है. इस रोल को जीवंत करने के लिए वे फिल्म में पैंटी और पैड तक पहन लेते हैं. जब कोई उनकी बात नहीं समझता तब उनके चेहरे पर मजबूरी दिखाई देती है. उन्हें देखकर ये कहा जा सकता है कि इस रोल को उनसे बेहतर शायद ही कोई निभा सकता था. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस तरह का चुनौतीपूर्ण रोल करना हर किसी के बस की बात भी नहीं है. पर्दे पर ज़्यादातर एक्टर्स एक्शन और रोमांस ही करना चाहते हैं. कोई ऐसे सामाजिक मुद्दों पर फिल्म नहीं बनाना चाहता क्योंकि उनकी छवि का सवाल होता है. लेकिन ये फिल्म करके अक्षय कुमार हीरो से सुपरहीरो बन गए हैं. इससे पहले भी उन्होंने 'टॉयलेट एक प्रेम कथा' को चुना और लोगों ने उसे भी देखा. इस फिल्म के साथ अक्षय ने बिना कुछ कहे बॉलीवुड सुपरस्टार्स को ये संदेश भी दिया है कि वास्तविक मुद्दों पर भी इंटरटेनिंग फिल्में बनाई जा सकती हैं. साथ ही, अब स्टारडम बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि आप दर्शकों को कुछ नया दें और एक्सपेरिमेंट करते रहें.

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लक्ष्मी जो कुछ भी है वो गायत्री यानि राधिका आप्टे की वजह से है. इससे पहले राधिका 'पार्च्ड' में ग्रामीण महिला की भूमिका में दिख चुकी हैं और उन्होंने अपनी भूमिका से इस फिल्म में जान डाल दी है. वहीं सोनम कपूर के लिए भी ये फ्रेश स्टार्ट है. इसमें आधी फिल्म में राधिका है और बाकी में सोनम हैं और दोनों ने ही अपना दम दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

डायरेक्शन

इस फिल्म के डायरेक्टर आर. बाल्की हैं जो अपनी हर फिल्म में दर्शकों के सामने कुछ नया परोसते हैं. टीवी पर बहुत ज्यादा पॉप्युलर होने वाले सैनिटरी पैड्स के जैसे 'दाग अच्छे हैं', 'वॉक एंड टॉक' और 'जागो रे' जैसे एड्स के आइडियाज़ उन्हीं के हैं. इसके बाद फिल्मों की बात करें तो 'चीनी कम', 'पा', 'शमिताभ', 'की एंड का' और अब पैडमैन. अगर आपने उनकी ये फिल्में देखी हैं तो जरूर समझ पाएंगे कि कुछ नया करना ही उनका जुनून है और इस बार उन्होंने बिना कुछ घुमाए-फिराए बहुत सटीक तरीके से अपनी बात कह दी है. सैनिटरी पैड के इस्तेमाल को उन्होंने पर्दे पर इस तरीके से उकेरा है कि चाहे स्कूली लड़कियां हों, गांव की औरतें हों या फिर पुरुष हों...हर कोई इसे चाव से देखेगा और समझेगा भी.

फिल्म की कहानी भी बाल्की ने ही लिखी है. वे यहां भटके नहीं हैं. दरअसल सैनेटरी पैड को केंद्र में रखकर उन्होंने एक तीर से कई शिकार किए हैं. सोनम कपूर का एक डायलॉग है- 'तुम गांव हों, मैं शहर...इन्हें तो आज तक डिजिटल इंडिया भी नहीं जोड़ पाया.' ये सीन आता है और निकल जाता है लेकिन ये एक बहुत बड़ी हकीकत को बस एक डायलॉग में बयां कर जाता है.

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कमियां

इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी ये है कि इसमें कई सारे सीन सरकारी विज्ञापन जैसे हैं. हो सकता है कि ऐसा इसलिए भी किया गया हो ताकि कहानी ज्यादा फिल्मी ना हो जाए लेकिन ये बातें खटकती हैं. इसमें सैनेटरी पैड के साथ-साथ महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने पर भी जोर दिया गया है. ऐसे सीन्स को बिल्कुल सरकारी विज्ञापनों के जैसे ही फिल्मा दिया गया है. महिलाओं का बैंक जाना, लोन लेना, चुका देना...इत्यादि. हालांकि इसे भी पैड मैन की कहानी के साथ जोड़कर ही दिखाया गया है. इतना ही नहीं जब फिल्म शुरू होती है तो कुछ देर तक लगातार ऐसा लगता है देखने वाला कोई विज्ञापन देख रहा है. करीब आधे घंटे बाद फिल्म रफ्तार पकड़ती है और फिर कहीं भी ध्यान भटकने नहीं देती. 

कुछ डायलॉग सोचने पर मजबूर करते हैं-

फिल्म में एक सीन है जो उन लोगों को जरूर वास्तविक लगेगा जिन्होंने कभी पैड खरीदा हो. लक्ष्मी जब पैड खरीदने जाता है तो दुकानदार न्यूज़पेपर में लपेटकर पैड काउंटर के नीचे से थमा देता है. तब पैडमैन पूछता है- 'चरस-गांजा दे रहे हो क्या?' सीन तो खत्म हो जाता है लेकिन सवाल बना रहता है. उम्मीद है कि फिल्म देखने के बाद ना पैड मांगने वाला शर्माएगा और ना ही देने वाला.

म्यूजिक

इस फिल्म की शुरुआत ही 'आज से मेरी' गाने से हुई है. बिना समय गंवाए एक गाने में ही शादी, प्यार, इश्क और लक्ष्मी-गायत्री की बॉन्डिंग को दिखा दिया गया है. फिल्म का म्यूजिक अमित त्रिवेदी ने दिया है और गीत कौसर मुनीर ने लिखे हैं. सारे ही गाने बहुत प्यारे हैं और सुनने में भी अच्छे लगते हैं. 'आज से मेरी' गाना बहुत ही रोमांटिक है और पहले ही पॉप्युलर हो चुका है. 'हुबहू' गाना भी लोग पहले ही खूब देख चुके हैं. पैडमैन की बैचेनी को दिखाने के लिए 'साले सपने' गाने को रखा गया है जो सटीक लगता है.
क्यों देखें

ये फिल्म हर किसी को इसलिए देखनी चाहिए ताकि वो आसानी से समझ सके कि पीरियड औरतों की बीमारी नहीं है. हां, अगर उसे लेकर सावधान नहीं रहे तो बीमारी जरूर हो सकती है. घर हो, परिवार हो या फिर स्कूल...इसके बारे में खुलकर बात होनी चाहिए. पीरियड्स को लेकर ना शर्माने की जरूरत है और ना ही छिपाने वाली कोई बात. आपको जानना चाहिए कि 15 से 24 साल की उम्र की लड़कियों में से 42 फ़ीसदी ही सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, बाकी  62 फ़ीसदी कपड़े, पत्ते या फिर राख तक का इस्तेमाल करती हैं जिससे कई बड़ी बीमारियां होती हैं. ये आंकड़े कुछ समय पहले नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने जारी किए थे. ये फिल्म आपको यही समझाने में मदद करेगी कि ये शर्माने का नहीं बल्कि कुछ कर दिखाने का मौका है. सोच बदलेगी तभी हालात बदलेंगे. तो इस वीकेंड आप अपने परिवार के साथ कुछ नया देखिए ताकि जिस पर आपने अबतक कोई बात नहीं कि वो फिल्म के जरिए कुछ ही घंटो में समझ आ जाए.


Thursday, January 25, 2018

Padmaavat Movie Review

स्टार कास्ट: दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह, जिम सरभ, रज़ा मुराद, अनुप्रिया गोयंका

डायरेक्टर: संजय लीला भंसाली

रेटिंग: 3.5

'एक जंग हुस्न के नाम...' ये इस फिल्म का एक डायलॉग है और पूरी फिल्म इसी के इर्द गिर्द घूमती है. ये जंग रानी पद्मावती को पाने के लिए सनकी, पागल सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी शुरू करता है. इस फिल्म में जंग सिर्फ राजपूतों और खिलजियों के बीच नहीं होती बल्कि हर किरदार एक जंग लड़ रहा होता है. पद्मावती अपनी मर्यादा बचाने की जंग लड़ती हैं, राजा रतन सिंह चित्तौड़ और राजपूतों की आन-बान और शान के लिए लड़ रहे होते हैं. खिलजी की पत्नी मेहरून्निसा अपने ही पति से लड़ती है.

इस फिल्म को लेकर उपजे विवाद के बाद सेंसर बोर्ड ने फिल्म का नाम बदलने और डिस्क्लेमर लगाने के लिए कहा था. फिल्म शुरू होने से पहले ही ये डिस्कलेमर आता है कि कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और ये फिल्म कहीं से भी सती प्रथा को बढ़ावा नहीं देती है. लेकिन फिल्म में 'जौहर' को जितना महिमामंडित (ग्लोरिफाई) करके दिखाया गया है वो दिमाग पर बहुत ही गहरी छाप छोड़ती है. डिस्क्लेमर में ये भी बता दिया गया है कि फिल्म की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी की 1540 में लिखी कविता 'पद्मावत' पर आधारित है जिसमें रानी पद्मावती के साहस और रापजूपों के वीरता की गाथा है.
फिल्म में एक भी विवादित सीन नहीं है

 फिल्म देखने के बाद इस पर हो रहा विवाद भी पूरी तरह खत्म हो जाता है. इस फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे किसी की भावना को ठेस पहुंचे. रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के जिस ड्रीम सीक्वेंस को लेकर इतना बवाल हो रहा है वैसा इस फिल्म में कुछ है ही नहीं. यहां तक कि ये दोनों किसी फ्रेम में साथ तक नहीं दिखे हैं. फिल्म देखने के बाद तो ऐसा ही लगता है कि फिल्म का नाम 'पद्मावती' होता तो भी राजपूतों की शान को कोई ठेस नहीं पहुंचती. फिल्म राजपूतों की शौर्य गाथा तो है, इसमें उनके बखान में इतने ज्यादा डायलॉग भर दिए गए हैं कि दो चार तो आपको भी याद रह जाएंगे.
जिस घूमर गाने को लेकर आपत्ति थी उसमें एडिटिंग के जरिए पद्मावती की कमर को ढ़क दिया गया है. संभव है इससे आहत भावनाओं को थोड़ी राहत मिले लेकिन ढकी कमर के बावजूद गाने की सेक्स अपील बरकरार है. दरअसल फिल्म में जिस हद तक जाकर राजपूतों की वीरता का बखान किया गया है, उससे तो तमाम शिकवे शियाकत दूर हो जाने चाहिए. उल्टे फिल्म देख कहीं राजपूत भंसाली के फैन मत हो जाएं.

भारतीय सिनेमा की पहली IMAX 3D फिल्म है 'पद्मावत'

'पद्मावत' भारत की पहली ऐसी फिल्म है जो IMAX 3D में रिलीज हो रही है. भंसाली अपनी फिल्म को भव्य और विजुअली प्रभावशाली बनाने के लिए ही जाने जाते हैं. 3डी में देखते समय ये फिल्म कहीं कहीं पर रोमांच पैदा करती है और बहुत ही अलग अनुभव देती है. फिल्म में 3डी इफेक्ट की वजह से जब युद्ध के सीन चल रहे होते हैं तब ऐसा लगता है कि तीर सीधा आकर आपको ही लग रहा है. भारतीय सिनेमा और दर्शकों के लिए ये फिल्म इस लिहाज से बहुत ही बेहतरीन है.

एक्टिंग

फिल्म में हर किरदार ने बहुत ही शानदार अभिनय किया है. लेकिन सबसे वजनदार हैं रणवीर सिंह जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के किरदार को ऐसे जीवंत किया है कि उन्हें देख नफरत सी होने लगती है. उनके चेहरे पर ही नहीं, उनकी आंखों में भी हवस और वहशीपन नज़र आता है और दिमाग में समा जाता है. शायद उनसे बेहतर ये किरदार कोई और नहीं निभा पाता.

ranveer singh

पद्मावती की भूमिका में दीपिका पादुकोण गज़ब की लग रही हैं. उन्होंने अपने हर सीन को बहुत ही असरदार बना दिया है. चाहें प्यार हो या फिर दर्द.. इस फिल्म में उनकी आंखें बोलती हैं. हालांकि उनका ये रूप रंग दर्शक 'रामलीला' और 'बाजीराव मस्तानी' में भी देख चुके हैं. अब इससे कुछ समय के लिए उन्हें बाहर निकलना चाहिए. दीपिका खूबसूरत तो हैं हीं लेकिन इस फिल्म में उनके कॉस्ट्यूम और जुलरी ने उन पर चार चांद लगा दिए हैं.

राजा रतन सिंह के किरदार में शाहिद कपूर ने भी अच्छा किया है हालांकि कहीं-कहीं तो शाहिद इतने भावशून्य दिखे हैं कि लगता है कि उनका पुतला रख दिया गाय है जो कभी-कभी आंखे झपकाता है. दीपिका के साथ उनके प्यार और रोमांस वाली केमेस्ट्री जमी है.
अभिनेता जिम सरभ इस फिल्म में सरप्राइज पैकेज की तरह हैं. उन्होंने गुलाम मलिक काफूर का किरदार निभाया है. फिल्म में  राजा रतन सिंह से उनके परिचय में कहा जाता है कि 'उन्हें खिलजी का बेगम ही समझ लीजिए.' जिम ने फिल्म में खिलजी के लिए रोमांटिक गीत भी गाया है जिस पर खिलजी डांस करता है.

फिल्म में एक किरदार जिसने बहुत ही निराश किया है वो हैं अनुप्रिया गोयंका जिन्होंने रतन सिंह की पहली पत्नी नागमति का किरदार निभाया है. अनुप्रिया ने अपने हर सीन को बहुत ही कमजोर बना दिया है. उनके चेहर पर ना तो कहीं भाव दिखता है और ना ही वो अपना डायलॉग ढ़ंग से बोल पाई हैं. अगर अपने किरदार की तैयारी के लिए वो बाजीराव मस्तानी में काशीबाई (प्रियंका चोपड़ा) को भी देख लेतीं तो शायद बहुत अच्छा कर सकती थीं.

इसमें अलावा इस फिल्म में अदिती राव हैदरी और रजा मुराद सहित सभी एक्टरों ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है.

डायलॉग

ये फिल्म बहुत लंबी है लेकिन जो चीज इसे देखने लायक बनाती है उनमें से एक हैं इसके दमदार संवाद. करीब पौने तीन घंटे की इस फिल्म के हर सीन में एक ऐसा डायलॉग है जिसे सुनकर आपको मजा आ जाएगा. जैसे-


  • कह दीजिए अपने सुल्तान से कि उनकी तलवार से ज्यादा लोहा हम सुर्यवंशी मेवाड़ियों के सीने में है- राजा रतन सिंह

  • अल्लाह की बनाई हर नायाब चीज पर पहला हक़ खिलजी का है- खिलजी

  • पहले तीर से घायल किया और अब तेवर से- राजा रतन सिंह

  • जिस इतिहास में मेरा नाम नहीं उसे सजा दे रहा हूं- खिलजी

  • सुल्तान बनने के लिए गर्दन और इरादे दोनों मजबूत होने चाहिए- खिलजी

  • तुमने हमारा सबसे बड़ा ख्वाब छीन लिया हम तुमसे तुम्हारा वजूद छिन लेंगे- खिलजी

  • चित्तौड़ के आंगन में एक और लड़ाई होगी जिसे आजतक ना किसी ने देखी होगी ना किसी ने सुनी होगी और यही अलाउद्दीन खिलजी की सबसे बड़ी हार होगी- पद्मावती

  • राजपूती कंगन में उतनी ही ताकत है जितनी राजपूती तलवार में- पद्मावती

  • चिंता को तलवार की नोक पे रखे, वो राजपूत...रेत की नाव लेकर समुंदर से शर्त लगाए, वो राजपूत...और जिसका सर कटे फिर भी धड़ दुश्मन से लड़ता रहे, वो राजपूत- राजा रतन सिंह

डायरेक्शन

भंसाली जिस तरह की फिल्में बनाते हैं आए हैं 'पद्मावती' का नाम भी उसी में जुड़ गया है. इस फिल्म को बनाने में 200 करोड़ खर्च हुए हैं. ये भव्यता फिल्म में भी दिखती है. हर एक सीन वास्तविक लगता है, कोई भी सीन नकली नहीं लगता. हालांकि युद्ध के सीन थोड़ कमजोर लगते हैं. ये सीन आते है और तुरंत खत्म हो जाते हैं. जौहर के जिस सीन को भंसाली ने बहुत ही खींचा है अगर उसकी जगह वो रणभूमि के दृश्यों पर ध्यान देते तो बात ही कुछ और होती. भंसाली के सिनेमा का अपना स्टाइल है और वो उसी के लिए जाने जाते हैं लेकिन अब उन्हें अपने एक ही तरह के इस ढर्रे से निकलना चाहिए. इस फिल्म को देखते समय उनकी पिछली फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' और 'रामलीला' की याद आ जाती है. इसकी वजह कुछ और नहीं बल्कि कुछ दृश्यों का एक ही तरह फिल्माया जाना है.

म्यूजिक

फिल्म के गाने भी भंसाली ने ही लिखे हैं और उसका फिल्म स्कोर संचित बलहारा ने तैयार किया. इसमें पारंपरिक धुनों को इस तरह पिरोया गया है जिससे फिल्म को मजबूती मिलती है. फिल्म के बैकग्राउंड में जो धुन चलती है वो भी कानों को बहुत सुकून देती है. 'घूमर' गाना पहले ही हिट हो चुका है. इसके अलावा 'एक दिल एक जान' सहित कुल 6 गाने हैं जो फिल्म को देखने लायक बनाते हैं.

क्यों देखें

इस फिल्म ने रिलीज के लिए ही बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी है. फिल्म की शूटिंग के समय जो विवाद शुरू हुआ वो उसने थमने का नाम नहीं लिया. फिल्म में बदलाव कराए गए. फिल्म में इतना पैसा लगा है कि मेकर्स रिलीज के लिए हर शर्त मानने को तैयार हो गए. सुप्रीम कोर्ट ने भी रिलीज करने को मंजूरी दे दी है बावजूद इसके इस फिल्म का विरोध हो रहा है. लेकिन इन सब के इतर अगर आप भंसाली के फैन हैं, कुछ खूबसूरत देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को देखें. फिल्म कहीं-कहीं स्लो है लेकिन इसमें ना तो कुछ विवादित है और ना ही आपत्तिजनक. फिल्म की कहानी पहले से दर्शकों को पता है लेकिन इसे पर्दे पर किस तरह दिखाया गया ये जानने की ललक पूर फिल्म में बनी रहती है. अच्छी बात ये है कि इसे आप पूरी फैमिली के साथ देख सकते हैं.

Sunday, December 25, 2016

Dangal Movie Review

स्टार कास्ट: आमिर खान, सांक्षी तवर, फातिमा सना शेख, सान्या मल्होत्रा, ज़ायरा वसीम, सुहानी भटनागर, अपारशक्ति खुराना
डायरेक्टर: नितेश तिवारी
रेटिंग: ****
खेल पर बहुत सारी फिल्में बनी हैं लेकिन ‘दंगल’ फिल्म सबसे अलग है. इसे फिल्म को ज्यादा फिल्मी ना बनाते हुए डायरेक्टर नितेश तिवारी ने इस तरह परदे पर उकेरा है कि हर सीन, हर एक्सप्रेशन, हर डायलॉग सब रियलिस्टिक लगते हैं. फिल्मी मसाला ना होते हुए भी दो घंटे 50 मिनट की ये फिल्म आपको बांधे रखती है. फिल्म के हर सिचुएशन के साथ आप खुद को जोड़कर देखने लगते हैं. फिल्म में कॉमिक टाइमिंग इतनी सटीक है कि आप हंसते भी हैं और इमोशनल सीन में रोते भी हैं.
कहानी
‘दंगल’ हरियाणा के पहलवान महावीर सिंह फोगट के जीवन पर आधारित फिल्म है. एक बेटे के इंतजार में महावीर सिंह फोगट की चार बेटियां पैदा हो जाती हैं. महावीर सिंह को बेटा चाहिए क्योंकि वो अपना सपना अपने बेटे से साकार करना चाहता है. लेकिन सारे टोटके आजमा चुके फोगाट को उस समय जिंदगी में ‘किक’ मिलती है जब उसकी बेटियां अपने दांव-पेच से एक लड़के को पीट देती हैं. (ये एकदम वही वाली किक है जो सलमान खान अपनी फिल्म में ढ़ूढ रहे होते हैं.) इसके बाद ही महावीर सिंह अपनी बेटियों गीता और बबीता को कुश्ती के गुर सिखाकर उन्हें रेसलिंग का चैंपियन बनाता है.



लेकिन इस बीच किन उतार-चढ़ाव से उसे गुजरना पड़ता है और कितनी जलालत झेलनी पड़ती है ये भी दिखाया गया है. जैसा कि एक डायलॉग आपने ट्रेलर में देखा होगा कि ‘मेडलिस्ट पेड़ पर नहीं उगते, उन्हें बनाना पड़ता है  प्यार से, मेहनत से, लगन से….’. इस फिल्म की ये एक लाइन अपने आप में सारे दर्द बयां कर जाती है. बाप-बेटी के रिश्ते पर बनी ये फिल्म उनके प्यार, तकरार और फटकार तक सब कुछ दिखाती है.
कुछ ऐसे शॉट्स हैं कि आपकी सांसे थम जाती हैं!
फिल्म में रेसलिंग के कुछ ऐसे सीन हैं, शॉट्स हैं, जिन्हें देखते समय आप अपनी सांसे रोक लेते हैं. फिल्म के एक सीन में दिखाया गया है कि  महावीर सिंह फोगट और उनकी बेटी गीता के बीच अहं आ जाता है और दोनों कुश्ती लड़ते हैं. ये सीन बहुत ही इमोशनल और आंखों में आंसू ला देने वाला है. ऐसे ही फिल्म में रेसलिंग के कई सीन हैं जो दर्शक दिल थाम कर देखने को मजूबर हो जाता है.
ये डायरेक्टर की चतुराई ही है कि फिल्म में रेसलिंग की कुछ बारीक बातें ऐसे बता दी गई है जिससे दर्शकों को भी समझने में परेशानी ना हो. जैसे कि रेसलिंग में कब कितने प्वाइट्स मिलते हैं. फिल्म में बारीक चीजों पर भी मेहनत की गई है ताकि सीन परफेक्ट बनाया जा सके. करीब दो घंटे 50 मिनट की इस फिल्म में आप कही भी बोरियत महसूस नहीं करेंगे.
सभी किरदारों का अभिनय दमदार है
इस फिल्म में अपनी मंझी हुई और बेहतरीन एक्टिंग से आमिर खान ने ये साबित कर दिया है कि उन्हें मिस्टर परफेक्शनिस्ट यूं ही नहीं कहा जाता. इस भूमिका को जीवंत करने के लिए आमिर खान ने महावीर सिंह की जिंदगी को जिया है. उनकी तरह अधेड़ दिखने के लिए आमिर ने अपना वजन बढ़ाया है, उनकी तोंद निकली हुई है. उनकी चाल, ढाल और बोली सब ऐसे बदल गई है जिसे देखकर आप भूल जाएंगे कि आप एक सुपरस्टार को देख रहे हैं.
गीता-बबीता के रोल में चारों लड़कियों ने भर दी है जान
इस फिल्म में गीता और बबीता के बचपन का रोल जायरा वसीम और सुहानी भटनागर ने किया है तो वहीं बड़े होने के बाद की भूमिका फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा ने किया है. यहां अगर ज़ायरा की बात ना करें तो बेमानी होगी. ज़ायरा ने गीता को भूमिका को मजबूती दी है तो फातिमा ने उसे दमदार बना दिया है. ज़ायरा अपने रौबदार एडिट्यूड से गीता की भूमिका को और भी धाकड़ बना देती हैं.
इस फिल्म में सिर्फ आमिर खान परफेक्ट नहीं बल्कि उन्हीं की तरह इन चारों छोरियों ने भी अपना परफेक्शन दिखलाया है. इस रोल के लिए इन्होंने कई महीनों तक ट्रेनिंग ली है और वो मेहनत पर्दे पर साफ झलकती है.

इस फिल्म में सांक्षी तवर ने पास जितना कुछ भी है उन्होंने अच्छा किया है. इसमें महावीर सिंह फोगट के भतीजे की भूमिका में अपारशक्ति खुराना ने जान भर दी है.
‘दंगल’ की तुलना में कहीं नहीं टिकती ‘सुल्तान’
रिलीज से पहले इस फिल्म की सलमान खान की ‘सुल्तान’ से काफी तुलना हो रही थी. लेकिन ‘दंगल’ और ‘सुल्तान’ में स्टोरी से लेकर एक्टिंग तक, कोई तुलना ही नहीं है. दोनों फिल्में रेसलिंग पर जरूर बनी है लेकिन एक जैसा कुछ भी नहीं है. ‘सुल्तान’ में लव स्टोरी थी तो वहीं ये फिल्म बाप और बेटी के रिश्तों पर बनी है. फिल्म का एक डायलॉग जरूर ‘सुल्तान’ की याद दिलाता है जिसमें नैरेटर आमिर खान के बारे में बताता है, ‘वो पहलवानी छोड़ चुके हैं लेकिन पहलवानी ने उन्हें नहीं छोड़ा है.’ ऐसा ही एक डायलॉग ‘सुल्तान’ में था, ‘मैंने पहलवानी जरूर छोड़ी है पर लड़़ना नहीं भूला हूं.’
म्यूजिक-
इस फिल्म में प्रीतम ने म्यूजिक दिया है और अमिताभ भट्टाचार्य ने गानों के बोल लिखे हैं. सभी गाने बहुत ही शानदार हैं. ‘हानिकारक बापू’, ‘धाकड़’ और ‘गिल्हेरियां’ पहले ही पॉपुलर हो चुके हैं. अरिजित सिंह की आवाज में एक गाना है ‘नैना’ जो रूला जाता है.


नोटबंदी के दर्द से उबरने के लिए फिल्म देख सकते हैं!
ये फिल्म एक महावीर सिंह के संघर्ष, गीता-बबीता के मेहनत और लगन की कहानी दिखाने के साथ-साथ समाज में एक संदेश भी दे जाती है कि अब छोरिया किसी मामले में कम नहीं हैं. जैसा कि फिल्म में एक डायलॉग भी है ‘गोल्ड तो गोल्ड होता है छोरा लावे या छोरी…’ अब आप इस फिल्म को बेटियों के के लिए देखें, आमिर खान के लिए देखें या फिर गीता-बबीता की भूमिका में जान भरने वाली फातिमा-सान्या के लिए देखें. कुछ नहीं तो ये फिल्म कुछ  समय के लिए तो आपको नोटबंदी के दर्द से उबरने में जरूर मदद करेगी.

Tuesday, June 23, 2015

कल हज़ारों संदीप और जगेंद्र पैदा होंगे, कितनों की आवाज दबाओगे?

यहां हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है ,जो मिट्टी का फना होने से डरता है...
मशहूर शायर राजेश रेड्डी  का ये शेर मुझे लगातार कुछ दिनों से डरा रहा है. अभी मैं कन्फ्यूज हूं कि क्या आप भी आजकल डरे हुए हैं या नहीं? लोकतंत्र में लगे रोग को कौन से योग से मिटाया जाए.. समझ नहीं आता. मैं लोकतंत्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती हूं, मैं तो सिर्फ जीना चाहती हूं.. सच के साथ, इज्जत के साथ, परिजनों के साथ, अपनों के साथ, परायों के साथ.. यूं कहें तो सबके साथ.

यूपी के आतंक से अभी बाहर नहीं निकली कि मध्यप्रदेश की खबर ने झकझोर दिया. सुबह-सुबह ही सिहर उठी. सत्ता की हनक यूपी में दिखी तो एमपी में गुंडागर्दी का खौफ. लेकिन दोनों हादसों में समान बात ये थी कि दोनों जगह सच को दबाया गया. सच बोलने वाले को मौत के मुंह में ढकेल दिया गया. दोनों हादसों में सच को जिंदा जलाया गया. सच बिका नहीं तो जिंदा जला दिया गया. अब उस शहर में प्रेतों का बसेरा होगा. कोई आवाज नहीं निकलेगी. सब चुप.. बिल्कुल खामोश होंगे, ऐसा दबंगों को लगता है.
 
मध्य प्रदेश में खनन माफियाओं के ‘गुंडे’ एक पत्रकार का अपहरण कर उसे जिंदा जला दिये. जून महीने में यह दूसरी घटना है. इससे पहले यूपी के शाहजहां पुर में जगेंद्र सिंह को जलाकर मार दिया गया और जलाने वाले कोई और नहीं बल्कि पुलिस वाले थे जिन्होंने अखिलेश यादव के मंत्री के इशारे पर इस घटना को अंजाम दिया था..(मैं यहां कथित लगाना जरूरी नहीं समझती).

अखिलेश यादव के मंत्री राममूर्ति वर्मा को क्या पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया? क्या सरकार ने इस मुद्दे को इतनी गंभीरता से लिया कि आगे से कोई ऐसे अपराध को करने से पहले दस बार सोचे? जवाब है -नहीं. यूपी सरकार ने तो आनाकानी की.. उनका बस चलता तो केस भी दर्ज न होता वो तो भला हो मीडिया को जिसे जगेंद्र सिंह के दस दिन बाद ही सही लेकिन ये समझ आ गया कि इस मुद्दे को उठाना जरूरी है.

खुद जगेंद्र सिंह ने मरने से पहले अपना बयान दर्ज कराया था कि ‘मुझको गिरफ्तार करना था… तो कर लेते मगर पीटा क्यों? और आग क्यों लगा दी?’ इतना ही नहीं जगेंद्र सिंह ने मंत्री पर जलाने के आरोप लगाए. इसके बावजूद अखिलेश सरकार अब तक यह कह रही है कि बिना जांच के मंत्री को नहीं हटाया जाएगा.

तो जब यूपी में गुनाहगारों का पुलिस और प्रशासन कुछ नहीं बिगाड़ पा रही तो एमपी में कैसे बिगाड़ लेगी? शायद यही बात रही होगी संदीप कोठारी को जलाने वालों के मन में… तभी तो निडर होकर इसे अंजाम दे दिया.

अगर यूपी में हुई घटना पर कड़ी कार्रवाई होती मंत्री हों या पुलिस वाले उन्हें गिरफ्तार किया जाता. उन्हें कोर्ट तक घसीटा जाता तो शायद एक पल के लिए अपराध से पहले कोई सोचता भी. अभी तो यह घटना आम होती जा रही है. जिसके लिखने से कोई परेशानी है उसे ले जाओ जला दो. यूपी और एमपी में जांच की बात तो चल रही है लेकिन ऐसा ना हो कि जब तक जांच पूरी हो तब तक कई जागेंद्र और संदीप को अपनी जान की बलि चढ़ानी पड़े. एक के बाद होती ये घटनाए कई तरह के सवाल खड़े करती हैं. ये दोनों घटना कहीं न कहीं लोकतंत्र में आलोचना की घटती जगह का सबूत हैं.

आमतौर पर पत्रकारों पर हमले की खबरें आती रहती हैं लेकिन यह ध्यान देने की बात है कि जिन दो पत्रकारों की हत्या हुई है वे टीवी और अखबार के लिए नहीं बल्कि फेसबुक पर लिखते थे. ये दोनों फेसुबक पर ही खनन माफियाओं के खिलाफ अपनी मुहिम चला रहे थे. फेसबुक की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूपी और एमपी में खबर का खौफ इतना था कि ‘गुंडे’ इतनी खौफनाक हरकत करने से भी नहीं डरे ये…

संदीप और जगेंद्र की शहादत बेकार नहीं जाएगी. ये उन लाखों युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरेगी जो खुलकर अपनी बात लिख नहीं पाते थे. आज संदीप और जागेंद्र को तो मार दिया. कल हज़ारो संदीप और जागेंद्र होंगे. कितनों की आवाज दबा लोगे?

सोशल मीडिया से आ रही सूचना प्रवाह और अभिव्यक्ति की आजादी बचाने की जिम्मेदारी, कानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखने का जिम्मा और राजनीतिक समीकरणों को सुरक्षित बनाए रखने की मजबूरी के बीच भारतीय सत्ता तंत्र लोकतंत्र की कसौटी पर बार-बार इम्तिहान के दौर से गुजर रहा है.

Sunday, June 07, 2015

ऐसा देश जहां पढ़ाई के लिए ना कोई गरीब ना कोई अमीर...इसे ही तो कहते हैं #रामराज्य

‪#‎रामराज्य‬ के दूसरे एपिसोड में ऐसे देश की बात जहां पढाई के लिए ना कोई अमीर है ना ही कोई गरीब.. जहां 99 फीसदी बच्चें सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. कभी जंगलो के लिए मशहूर फिनलैंड में आज शिक्षा के क्षेत्र में रामराज्य हैं जहां 'Free & Equal Education To All' यानि सभी के लिये मुफ्त और एक जैसी शिक्षा व्यवस्था है. ना ही ड्रेस की फिक्र ना ही किताबों की और ना ही फीस की...इसे हो तो कहते हैं रामराज्य. सबसे अहम बात है कि यहां पर टीचर्स ट्रेनिंग मास्टर्स के बाद होती है जिसमें दाखिला लेना काफी मुश्किल होता है. यहां डॉक्टर और ऑफिसर से ज्यादा बच्चें टीचर बनना चाहते हैं. अगरआपने ये एपिसोड मिस कर दिया है तो यहां देख सकते हैं. इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

ABP न्यूज स्पेशल: फिनलैंड में है शिक्षा में 'रामराज्य'

Saturday, March 07, 2015

डॉक्यूमेंट्री विवाद: 'देश के करोड़ों मर्दों को पता तो चले कि वे रेपिस्ट की तरह सोचते हैं'




महज एक डॉक्यूमेंट्री पर बैन से क्या बदल जाएगा पुरुषप्रधान सोच?

निर्भया रेप कांड पर बनी डॉक्युमेंट्री 'इडियाज डॉटर' को लेकर संसद से सड़क तक हंगामा मचा हुआ है. भारत सरकार ने तो बैन लगा दिया लेकिन फिर भी लोगों ने इसे खूब देखा है. इसकी प्रसिद्धी का पूरा श्रेय भारत सरकार को ही जाता है. यह डॉक्यूमेंट्री महिला दिवस पर रिलीज होने वाली थी लेकिन आनन-फानन में बीबीसी ने ब्रिटेन में इसे पहले ही रिलीज कर दिया. इंटरनेट के जमाने में किसी फिल्म या वीडियो को बैन करने का कोई मतलब नहीं है. उधर रात तीन बजे ब्रिटने में इसका प्रसारण हुआ और इधर सुबह होते ही भारत में लोगों ने खूब देखा. इसे देखने के बाद मुझे लगा कि इस बेहद ही खूबसूरत डॉक्यूमेंट्री को सब को देखना चाहिए ताकि पुरुषप्रधान समाज की सोच से हर कोई वाकिफ हो सके.

कारण ये है कि आपको इस दिन महिला सशक्कितकरण और महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर समारोहों में तो खूब भाषण सुनने को मिलेंगे लेकिन कितने लोग उसमें इस बात को लेकर गंभीर हैं, यह कह पाना मुश्किल है. कम से कम इस डॉक्यूमेंट्री को देखकर महिलाएं अपने समाज और देश की सच्चाई से रूबरू तो हो पाईं. इसे देखकर एक बार फिर वो दर्द जी उठा जिसे लेकर लोग सड़कों पर उतरे थे. उस अंतहिन दर्द को फिर से महसूस कर पाएंगे जिसे भूलकर हम अपनी-अपनी जिॆंदगी में आगे बढ़ चुके हैं.

इस समय इस हकीकत को दिखाना बहुत ही जरूरी था. अगर ऐसा नहीं होता तो एक बार फिर देश में निर्भया की गूंज न होती.

दुख इस बात का है कि जो सरकार यह नारा देती है ''नहीं होगा नारी पर वार'' उसने ही इस पर बैन लगा दिया. यहां बात रेपिस्ट की नहीं यहा बात निर्भया की है, उसके अस्तित्व की है, उसके सम्मान की थी. ये कैसा देश है मेरा जहां सरकार निर्भया फंड में 1000 करोड़ तो दे सकती है लेकिन उस पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री को दिखाने पर पाबंदी लगा देती है. ये नारी के साथ कैसा न्याय है?

बैन भी इसलिए क्योंकि इसमें रेपिस्ट का इंटरव्यू है. लेकिन किसी भी फिल्म या डॉक्यूमेंट्री को देखे बिना ही बैन लगाने की वजह समझ नहीं आती. रेपिस्ट के जिस बयान को लेकर इतना हंगामा हुआ उसे जानना भी जरूरी था. उसकी बातें किसी भी मामले में समाज के बहुतेरे लोगों के बयान से अलग नहीं था. जैसा कि जावेद अख्तर ने कहा भी कि ''मर्दों को पता तो चले कि वे रेपिस्ट की तरह सोचते हैं.''

इस डॉक्यूमेंट्री में अगर कुछ विवादित है तो वह है दरिंदों के दोनों वकील का बयान. डॉक्यूमेंट्री में वकील एपी शर्मा बड़े ही गर्व से कहते हैं कि 'अगर मेरी बहन या बेटी शादी के पहले ऐसे काम करती हैं तो मैं पूरे परिवार के सामने उस पर पेट्रोल डालकर जला दूंगा.' दूसरे वकील एम एल शर्मा ने भी कहा है कि यदि लड़कियां बिना पर्याप्त सुरक्षा के बाहर जाती हैं, तो बलात्कार की ऐसी घटनाएं होनी तय हैं. रेपिस्ट मुकेश का भी बयान है कि जिसमें उसका कहना है कि ''शरीफ लड़कियां रात में नहीं घूमती हैं..लड़कों से ज्यादा लड़कियां रेप के लिए जिम्मेदार हैं.'' मुझे कहीं से भी नहीं लगता कि वकीलों और रेपिस्ट दरिंदे के बयान में कोई फर्क है.

अब सोचने वाली बात यही है कि जिस देश में वकील का काम एक संभ्रात पेशा माना जाता है. अब जिस देश में वकील ही यह सोचता हो वहां पर महिलाओं की स्थित का अंदाजा लगाया जा सकता है. यहां हम कदम से कदम मिलाकर चलने की बात करते हैं उसी जगह वकील एवं शिक्षित वर्ग इस तरह का शर्मनाक रूख रखता है. जिस सरकार ने एक रेपिस्ट की वजह से इस पर बैन लगा दिया बिना यह जानें कि इसमें क्या है क्या नहीं? उस सरकार के कानों तक क्या उस वकील की आवाज नहीं पहुंची. इस डॉक्यूमेंट्री के रिलीज होने के चार दिन बाद बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने उन्हें नोटिस भेजा है.

गौर करने वाली एक बात यह भी है कि इसमें जेल में रेपिस्टों के मनोचिकित्सक बताते हैं, 'जेल में कुछ ऐसे अपराधी भी हैं जो बताते हैं कि उन्होंने 200 से ज्यादा रेप किए हैं और उन्हें करीब 12 बार ही सजा हुई हैं. उनका यह भी कहना है कि उन्हें सिर्फ 200 याद हैं हो सकता है कि इससे भी ज्यादा बार किए हों.'

इसे पढ़ने के बाद आपको यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अपराधी के मन में कोई डर है. उनका सोचना तो सिर्फ यही है कि सरकार क्या कर लेगी. और सोचेंगे भी क्यों नहीं? इतने बड़े आंदोलन के बाद भी निर्भया के मां-बाप आज भी दोषी को सजा दिलाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. जिस केस के लिए पूरा देश सड़को पर आ गया जब उसका ही कुछ नहीं हुआ तो बाकियों का क्या होगा?

इसमें दरिंदो के परिवार, वकील, रेप कानून पर बनी जस्टिस जे एस वर्मा कमेटी लीला सेठ और गोपाल सुब्रमणयम का इंटरव्यू दिखाया गया है. उस पुलिस ऑफिसर ने अपना पक्ष रखा है जिसने पहली बार निर्भया और उसके दोस्त को नग्न अवस्था में देखा था, सफदरजंग की उस डॉक्टर को जगह दी गई है जिसने निर्भया का इलाज किया था. इस केस की पड़ताल कर रहे पुलिस ऑफिसर, और रेपिस्टों के परिवार को भी जगह दी गई है. इसमें निर्भया के अध्यापक ने कई अनजान पक्ष को भी बताया है. जब टीचर ये कहता है 'उसके सपने थे... बहुत सारे सपने थे बहुत बड़े सपने थे....' तो आपको रोंगेटे खड़े हो जाते हैं. निर्भय़ा के मां-बाप जब उसकी छोटी-छोटी बातें को शेयर करते हैं तो ऐसा लगता है कि कोई फिर से उस घाव को कुरेद रहा है.


इस डॉक्यूमेंट्री की डायरेक्टर लेसली उडविन ने महिलाओं के उस दर्द को बयां कर दिया है जो वो कब से अपने सीने में दबाएं बैठीं थी. ऐसी करने की हिमाकत आज तक कोई नहीं कर पाया. जहाँ पर इस हकीकत को देखकर एक बार फिर आपका दिल दहल जाएगा वहीं अगर इसके पीछे का सच आपको रूला देगा. विवादों के बीच यह डॉक्यूमेंट्री आपके मन मैं कई ऐसे सवाल छोड़ जाएगी जिसका जवाब आपको खुद ही ढ़ूढ़ना होगा.

Thursday, February 05, 2015

AIBKnockout का विरोध करने वाले पाखंडी, बताएं पॉर्न कटेंट का क्या करेंगे?


AIBKnockOut को लेकर सोशल मीडिया पर बवाल मचा हुआ है. कोई इसे भारतीय संस्कृति को बर्बाद करने वाला बता रहा है, तो किसी का कहना है कि भारतीय लोगों में एक मज़ाक को सहने तक क्षमता नहीं है. इन दिनों चल रही इस बहस के बीच AIB(आल इंडिया बकचोद) ने इस वीडियो को यह कहते हुए यूट्यूब से हटा लिया है कि लोग चाहें कुछ भी कहें लेकिन यह सिर्फ मजाक था और कुछ नहीं.



मुंबई की एक संस्था द्वारा AIB की टीम, बॉलीवुड अभिनेता रनवीर सिंह, करन जौहर और अर्जुन कपूर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया है. सरकार ने जांच की बात कही और उसी बीच सेंसरबोर्ड के सदस्य अशोक पंडित के एक कमेंट से इस विवाद को और हवा मिल गई.

अशोक पंडित ने सीधा करन जौहर को निशाने पर लिया. ध्यान देने की बात ये है कि जिस वीडियो को अशोक पंडित 'अश्लील' बता रहे हैं उससे भी ज्यादा 'अश्लीलता' इनके ट्वीट्स में झलकती है. मुझे तो क्या ट्विटर पर एक अच्छे खासे वर्ग को इनका ट्वीट पसंद नहीं आया. तो क्या अब हम अशोक पंडित के ट्विटर अकाउंट को भी बैन करने की मांग करने लगेंगे?


साधारण सी बात है कि अगर मुझे उनकी सोच, उनकी भाषा समझ नहीं आई तो उन्हें फॉलो नहीं करेंगे या उनके ट्वीट्स नहीं पढ़ेंगे. बस यही बात अगर आप AIBKnockOut के मामले में भी लागू कर दें तो इतने हंगामे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.


वीडियो हटने के बाद भी सोशल मीडिया पर लगातार बहस चल रही है. पूरा बॉलीवुड AIB के साथ है. आलिया भट्ट से लेकर दूसरे एक्टर्स ने भी AIB के समर्थन में अपनी राय बेबाकी से रखी है.


जिस संस्था ने इस वीडियो के खिलाफ मुंबई में शिकायत दर्ज कराई है उसका कहना है कि इसमें काफी गाली गलौज है. यह न सिर्फ भारतीय संस्कृति और महिलाओं की छवि को बर्बाद कर रहा है बल्कि आज के युवाओं को गुमराह भी कर रहा है. अब ऐसे में सवाल ये है कि क्या इंटरनेट पर गुमराह करने के लिए सिर्फ रोस्ट वीडियो की उपलब्धता है? वैसे तो AIB का यह वीडियो सिर्फ एडल्ट्स के लिए था जो कि आप लॉगिन करने के बाद ही देख सकते थे.


आज के दौर में अगर हम इंटरनेट की बात करें तो यहां पर हज़ारों और लाखों की संख्या में पॉर्न साइट्स उपलब्ध हैं जिन्हें आसानी से सर्च करके देखा जा सकता है. आप युवाओं के सर्च करने और इंटरनेट यूज करने पर बैन नहीं लगा सकते हैं. आपने एक वीडियो को तो हटवा दिया लेकिन उन हजारों और लाखों की संख्या में इटंरनेट पर उपलब्ध पॉर्न कंटेंट का क्या करेंगे? जिन्हें अक्सर ही रेप और छेड़खानी जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है. क्या आपने उन वेबसाइट्स को बैन कराने के लिए कुछ किया है? कोई शिकायत कोई FIR दर्ज कराई है. नहीं ना, तो फिर इस पर क्यों?


क्या भारत में बैन करने और बहस करने के लिए सिर्फ यही आखिरी चीज बची है? क्या इस वीडियो को हटाने से आपकी भारतीय संस्कृति बर्बाद होने से बच गई? मेरा सवाल ये है कि क्या शोषण करो, छेड़खानी करो और बलात्कार करो भारतीय संस्कृति है. नहीं ना, फिर भी ऐसी घटनाएं रोज सुनने और देखने को मिलती हैं. अगर आपको रोकना ही है तो रेप होने से रोकिए, हत्याएं रोकिए, भूखमरी रोकिए, किसानों को आत्महत्या करने से रोकिए न की अपना कीमती समय इस बेवजह बहस पर खराब करिए.

AIBKnockOut एक वीडियो है जिसमें हंसी-मजाक उसी लेवल का है जो आप भी करते हैं और उतनी ही अश्लील बातें और मैसेज आज के युवाओं के मैसेज बॉक्स में होती हैं. वीडियोज भी आप चुपचाप देख ही लेते हैं तो फिर इस वीडियो पर इतना पाखंड क्यों? क्या आप एक मज़ाक को मज़ाक की तरह नहीं ले सकते हैं? क्या आप हंसना भूल गए हैं? क्या आपने कभी किसी से इस लेवल का मज़ाक नहीं किया? या फिर किसी की खिंचाई नहीं की? अगर आपका जवाब हां है तो पाखंड बंद कीजिए और अगर ना है तो आप वाकई बीमार हैं आपको चेकअप की जरूरत है.

भारत के लिए यह शो अपने तरह का एक नया एक्सपेरिमेंट है. जिसे लोगों ने सराहा भी है और आलोचना भी की है. आलोचना तक तो ठीक है क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि जहां भारत दुनिया के बाकी देशों से कदम से कदम मिलाकर चलने की बात कर रहा है उसी देश के लोग मजाक को भी बर्दाश्त करने की मानसिकता नहीं रखते हैं. लोग मज़ाक पर भी अभियान चलाने लगते हैं और उसे बैन करने की मांग करने लगते हैं.


गौरतलब है कॉमेडी रोस्ट की शुरुआत अमेरिका में सबसे पहले हुई थी. पहली ऑफिशियल रोस्ट न्यूयॉर्क के फ्रायर्स क्लब के स्टैंड अप कॉमेडियन Maurice Chevalier के साथ हुई थी. लेकिन भारत के उलट अमेरिका में लोगों ने इस शो को हाथोंहाथ ले लिया था और खूब सराहना की थी. यहां तक की व्हाइट हाउस में होने वाले वार्षिक कॉरेस्पोंडेंट भी कई बार प्रेसीडेंट को ‘रोस्ट’ करते हैं. 2006 में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज ड्ब्ल्यू बुश को स्टैंडअप कॉमेडियन स्टेफन कोलबर्ट ने रोस्ट किया था. बुश ने उस मज़ाक को बहुत ही अच्छे तरीके से लिया था ना कि सब पर हंगामा मचाया था.

जिस कॉमेडी रोस्ट पर लोग इतना बवाल मचा रहे हैं वैसा ही शो भारत के लोग सालों से देखते आ रहे हैं. सिर्फ इसका प्रॉडक्शन पहली किसी ने किया है? भारत के लोग इसे कई सालों से टेलिविजन पर देखते आ रहे हैं. यूएस का चैनल कॉमेडी सेंट्रल ने 1998 में 'कॉमेडी चैनल रोस्ट' नाम की एक सीरिज की शुरूआत की थी. अब इस चैनल पर प्रसारित होने वाला यह 'कॉमेडी रोस्ट' भारत सहित कई देशों के लोग देखते हैं. यह चैनल भारत में हर तरह के केबल नेटवर्क पर उपलब्ध है. अगर इससे युवाओं पर बुरा असर पड़ता है तो इस पर बैन की मांग क्यों नहीं की गई है? इस पर विवाद क्यों नहीं हुआ?


अब इसी शो की तर्ज पर AIBKnockOut ने इसे भारत में लॉन्च किया है. तीन घंटे तक शूट होने वाले इस शो को एडिट करके सिर्फ आधे घंटा यू-ट्यूब पर डाला गया था. जिस पर इतना हंगामा हुआ अगर पूरा डाल दिया जाता तो पता नहीं क्या हो जाता. शो को लाइव देखने के लिए चार हजार लोग पहुंचे थे. वे लोग पूरे चार हजार रुपये देकर इस कथित अश्लीलता को देखने और गाली गलौज सुनने गए थे. आखिर जब उन्हें कोई दिक्कत नहीं है तो आपको क्यों हैं ? किसी ने आपको यूट्यूब पर जाकर उस वीडियो को देखने को तो नहीं कहा ? वीडियो हटाए जाने से पहले करीब 70 लाख लोगों ने खुद ही जाकर AIBKnockOut के इस कथित अश्लील वीडियो को देखा.


आप किसी चीज से सहमत या असहमत हो सकते हैं. अपने विचार रख सकते हैं. लेकिन दूसरों को क्या करना है और क्या नहीं करना हैं ? क्या देखना है और क्या नहीं देखना है ? क्या अश्लील है और क्या नहीं हैं ? आखिर ये तय करने वाले आप होते कौन हैं ?


इस पूरे प्रकरण को देख कर लगता है कि देश में संस्कृति के ठेकेदारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तिलांजलि दे दी है. हर कोई संस्कृति को अपनी सहूलियत के हिसाब से परिभाषित कर रहा है और अपने विचारों को दूसरे पर थोपने की कोशिश कर रहा है. इन संस्कृति के ठेकेदारों को वॉल्टेयर के विश्व प्रसिद्ध कथन को याद रखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने कहा था, ''हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊँ फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करने के लिए मैं अपनी जान भी दे सकता हूं"

Saturday, September 20, 2014

Movie Review: Not 'Khoobsurat' as old one, you can watch for Sonam-Fawad chemistry

सोनम कपूर और फवाद की शानदार कमेस्ट्री के लिए देखें खूबसूरत

रेटिंग:  ** (दो स्टार)

सोनम कपूर और फवाद स्टारर खूबसूरत 'वन टाइम वॉच' फिल्म है. अगर आप 1980 में रिलीज रेखा की 'खूबसूरत' से इसकी तुलना करेंगे तो थोड़े निराश हो सकते हैं. उस 'खूबसूरत' के सामने यह फिल्म बहुत ही हल्की लगती है. सोनम और फवाद की केमिस्ट्री के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है. इस फिल्म में सोनम कपूर को देखकर कहीं कहीं लगता है कि वह एक्टिंग कम, ड्रामा ज्यादा कर रही हैं. लेकिन पाकिस्तानी एक्टर फवाद खान ने इस फिल्म को जान दे दी है. निर्देशक शंशाक घोष फिल्म में कहीं भी कन्फ्यूज्ड नहीं हुए हैं और जो दिखाना चाहते हैं उसी को दिखाया है.

कहानी :
दिल्ली की रहने वाली चुलबुली डॉक्टर मिली चक्रवर्ती (सोनम) एक साइकोथेरेपिस्ट हैं. मिली ऐसी डॉक्टर हैं जिन्हें सेल्फी लेने का शौक है और दो तीन बार ब्रेकअप हो चुका है क्योंकि उन्हें अपनी लाइफस्टाइल में कोई रोक टोक पसंद नहीं. मिली की मां मंजू चक्रवर्ती (किरण खेर) को बिना रोक टोक अपने बच्चों की परवरिश करने में यकीन है. मिली को संभलगढ़ के बीमार राजा शेखर राठौर को ठीक करने के लिए उनके महल में जाना पड़ता है जो कि खुद ही कभी ठीक नहीं होना चाहते. राठौर परिवार में हर एक काम निर्मला दास राठौर (रत्ना शाह पाठक) के नियम कायदे के मुताबिक होता है.
   
यहां परिवार के लोगों की इतनी फुरसत नहीं कि वे एक दूसरे से बात भी कर सकें. इस महल के कायदे को इग्नोर करते हुए मिली जैसी है वैसी बनकर यहां रहने की ठान लेती है. राजा शेखर के इलाज के दौरान मिली को युवराज विक्रम सिंह राठौर (फवाद खान) से प्यार हो जाता है, जिन्हें हंसना मुस्कुराना नहीं आता. राठौर परिवार के लोग मिली को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते. इन्हें लगता है कि मिली गैर-जिम्मेदार लड़की है. युवराज को भी मिली से प्यार है लेकिन उसे लगता है कि दोनों के बीच कुछ भी कॉमन नहीं है तो साथ में जिंदगी कैसे गुजारेंगे. फिर मिली किस तरह राठौर परिवार की सोच बदल देती है और दोनों की फैमिली इनकी शादी के लिए कैसे तैयार होती है यही पूरी कहानी है.

एक बात इस फिल्म में गौर फरमाने लायक है कि इस फिल्म में इस बात पर रिस्क नहीं लिया गया है कि आप सोनम और फवाद के एक्सप्रेशन देखकर अंदाजा लगाएं कि वे क्या सोच रहे हैं. जो बाते वे सोच रहे हैं वो भी आपको सुनने को मिल जाती है.

फिल्म में किरण खेर और रत्ना शाह पाठक, प्रसोनजीत चैटर्जी के शानदार अभिनय की वजह से आप इस पूरी फिल्म में बोर नहीं होंगे और एन्जॉय कर पाएंगे. फवाद खान अपना बॉलीवुड डेब्यू कर रहे हैं और फिल्म देखने के बाद उनके लिए लोगों का क्रेज और भी बढ़ने वाला है. फवाद खान अपने अभिनय की बदौलत सोनम कपूर पर भारी पड़े हैं.

फिल्म में सोनम कपूर सिर्फ अपने कॉस्ट्यूम से इंप्रेस करने में कामयाब होती हैं. सोनम कपूर को तो स्टाइल दीवा के नाम से ही जाना जाता है लेकिन कॉस्ट्यूम डिजायनर्स उमा बीजू, करूणा और राघवेंद्र राठौर ने इस फिल्म में उनके कॉस्ट्यूम पर बहुत ही खूबसूरत काम किया है. इसमें आपको कलरफुल कई तरह के स्टाइलिश कपड़ो में सोनम नजर आएंगी.

फिल्म के गाने 'इंजन की सिटी' और 'अभी तो पार्टी बाकी' है पहले ही लोगों को जुबान पर चढ़ चुके हैं. सोनम गाने में खूबसूरत और ग्लैमरस लगी हैं.

अगर आप वीकेंड पर अपने पूरे परिवार के साथ फिल्म देखना चाहते हैं तो यह अच्छा विकल्प है.


Tuesday, September 16, 2014

Well Done Deepika, किसी को तो आवाज उठाना ही था...

अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने अपनी एक तस्वीर को गलत एंगल से छापने को लेकर एक अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार पर अपना गुस्सा जाहिर किया है. गुस्से का कारण यह है कि अंग्रेजी अखबार ने अपनी वेबसाइट पर दीपिका पादुकोण की एक साल पुरानी वीडियो पोस्ट करके और लिखा- 'OMG! दीपिका का क्लीवजे शो! जवाब में दीपिका ने लिखा- मैं औरत हूं, मेरा ब्रेस्ट और क्लीवेज है आपको कोई प्रॉब्लम?
पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर यह हॉट टॉपिक बना हुआ है. कुछ लोग दीपिका के इस कदम का सराह रहे हैं तो कुछ को इसमें पब्लिसिटी स्टंट नजर आ रही है. दीपिका के इस ट्वीट के बाद कई तरह के रिएक्शन देखने को मिल रहे हैं. कोई सपोर्ट कर रहा है तो कोई आलोचना. कई तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं?

ऐसी खबर छापने वाला यह कोई इकलौता अखबार नहीं है. यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसी खबरें आपको आए दिन देखने और पढ़ने को मिल ही जाती हैं. लेकिन कोई भी स्टार इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. क्योंकि कोई भी स्टार मीडिया के साथ पंगा नहीं लेना चाहता. मीडिया साइडलाइन कर दे तो पॉपुलिरिटी कैसे मिलेगी, फिल्मों का प्रमोशन कैसे होगा? प्रमोशन नहीं हुआ तो फिल्म हिट कैसे होगी? बात इतनी सी है कि मीडिया का विरोध करके कोई अपनी लोकप्रियता नहीं खोना चाहता. इन सब की परवाह ना करते हुए अगर कोई विरोध का स्वर ऊंचा करें तो हमें उसे गंभीरता से लेना चाहिए.


एक लीडिंग डेली द्वारा ऐसी भाषा का इस्तेमाल शर्मनाक है. लेकिन हद तो तब हो गई जब गलती मानने के बजाय इस संस्था ने एक ट्विट करके सफाई दी, "दीपिका, हम तो आपकी तारीफ कर रहे हैं. आप बेहद खूबसूरत हैं और हम चाहते हैं कि हर किसी को इस बात का पता चले." भला कोई प्रशंसा भी इस तरह करता है जिससे किसी के आत्मसम्मान को चोट पहुंचे. इसे वाजिब ठहराना तो और भी शर्मनाक है.


जो लोग भी इसे पब्लिसिटी स्टंट बता रहे हैं शायद उन्हें भी यह बात पता है हो कि एक सेलिब्रिटी और मीडिया का चोली-दामन का साथ होता है. एक के बिना दूसरा अधूरा है. दीपिका के इस रिएक्शन के बाद उस अखबार की जितनी किरकिरी हुई है ऐसा शायद ही किसी के साथ हुआ हो. दीपिका या कोई भी फिल्मी हस्ती स्टंट के लिए एक बड़े अखबार के साथ ऐसा रिस्क कभी नहीं लेगा. पब्लिसिटी स्टंट करने के और भी कई रास्ते हैं लेकिन जिस अभिनेत्री ने यह विरोध जताया है कि वह कोई मामूली एक्ट्रेस नहीं बल्कि एक प्रतिष्ठित खिलाडी की बेटी और बॉलीवुड सुपरस्टार है. दीपिका को पब्लिसिटी के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं है.


किसी ना किसी को आवाज तो उठानी ही थी तो दीपिका क्यों नहीं? दीपिका का उन्हें उलटे मुंह यह जवाब बिल्कुल सही था कि वैसे तो आप महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं और दूसरी तरफ इस तरह ऑब्जेक्ट बनाकर गलत तरीके से लोगों के बीच पेश करते हैं.


दीपिका के आवाज उठाते ही पूरा बॉलीवुड उनके साथ हो गया. होता भी क्यों ना, ऐसा सिर्फ दीपिका के साथ तो नहीं हो रहा. आजकल मीडिया की भाषा और कंटेंट का स्तर गिरता जा रहा है. अक्सर ही हमें उप्स मोमेंट और इसी तरह की कई और सामग्री दिखने को मिलती ही रहती है. बिक्री बढ़ाने के लिए ऐसी खबरें कई छोटे-मोटे मैगजीन और न्यूज़पेपर छापते रहते हैं. लेकिन जब बात देश के एक लीडिंग न्यूज़पेपर की हो तो हम इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकते हैं. वैसे तो आप खुद को लोकतंत्र का चौथा हिस्सा बताते हुए सारी जिम्मेदारी अपने कंधो उठा लेते हैं लेकिन जब आप ऐसी खबर छाप रहे होते हैं तो आप इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे भूल सकते हैं.


एक हकीकत यह भी है कि जब बात महिलाओं के सम्मान की होती है तो मीडिया बात करने को लेकर सबसे आगे होती है. खासकर यहां काम करने वाले लोग भी जब टीवी पर बैठकर बहस करते हैं तो लगता है कि महिलाओं की इज्जत उनसे ज्यादा कोई नहीं करता. लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है. ये लोग तो अपने ही साथ काम करने वाली महिला सहकर्मियों की इज्जत करना नहीं जानते. हमेशा इस फिराक में रहते हैं कि कब मौक मिले और यह जता दें कि महिलाएं उनकी बराबरी नहीं कर सकती. खैर!


मीडिया की इस किरकिरी के बाद इस घटना को समझने और उस पर अमल करने की जरूरत है ना कि सिर्फ सहमति और असहमति दिखाकर निकल जाने की. जिस इंटरनेट के माध्यम से मीडिया अपनी खबरें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करता है आज वही ऐसा प्लेटफार्म बन गया है जहां आपको बहुत ही समझदारी से काम लेना होगा. नहीं तो, जो विश्वसनीयता बनाने में सालों लग गए उसे खराब करने के लिए कुछ ही पल काफी हैं. इसका उदाहरण आपके सामने है. मीडिया का काम सेलिब्रिटी के बारे में खबरें दिखाना जरूर है लेकिन उसके आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाकर अश्लील सामग्री पेश करना नहीं. दीपिका ने यह कदम उठाकर सराहनीय काम किया है. एक एक्टर होने से पहले आप एक इंसान हैं. खुद के लिए आवाज उठाना आपका हक है और ये आपसे कोई नहीं छीन सकता.

Friday, September 12, 2014

मूवी रिव्यू: अगर बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से बोर हो गए हैं तो जरूर देखें 'फाइंडिंग फैनी'

रेटिंग:   ***1/2   (साढ़े तीन स्टार)

अगर आप बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से कुछ अलग हटकर देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है. निर्देशक होमी अदजानिया ने इस फिल्म को बनाकर यह प्रूफ कर दिया है कि वह एक बेहतरीन निर्देशक हैं. यह फिल्म शुरूआत से लेकर खत्म होने तक अपने लक्ष्य से नहीं भटकती है. अदजानिया की पिछली फिल्म ‘कॉकटेल’ में उन्होंने दर्शकों को जो सिरदर्द दिया था उससे राहत देते हुए लोगों को एक शानदार फिल्म दी है.

हां, इतना जरूर है की फिल्म का फर्स्ट हाफ स्लो है लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म जब रफ्तार पकड़ती है कि आप कुछ पल के लिए अपनी दुनिया से बाहर निकल फिल्म में डूब जाएँगे.

फिल्म में नसीरूद्दीन शाह, डिंपल कपाड़िया और पंकज कपूर की तिकड़ी ने कमाल कर दिया है. दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर ने भी अपने हिस्से का अभिनय अच्छा किया है. हालांकि इस फिल्म में दीपिका को करने के लिए अलग कुछ भी नहीं था. इससे पहले भी वह कॉकटेल में ऐसा ही अभिनय कर चुकी हैं.

कहानी:
'फाइंडिंग फैनी' की कहानी गोवा के गांव 'पोकोलिम' शुरू होती है. यहां पर लोग बेवजह जी रहे होते हैं. उनकी जिंदगी जीने का उनके पास कोई मकसद नहीं है. फिल्म में पांच ऐसे ही लोगों की कहानी दिखाई गई है जिन्हें एक रोड ट्रीप की वजह से जिंदगी जीने का मकसद मिल जाता है.

दीपिका पादुकोण इस फिल्म में एक यंग विधवा एंजी का रोल कर ही हैं जिसका पति शादी के दिन ही केक खाकर मर जाता है. उसके बाद एंजी अपनी मदर इन लॉ रोजी (डिंपल कपाड़िया) के साथ रह रही होती हैं. एंजी को दूसरो की हेल्प करना पसंद है. गांव के ही एक दिन एक बूढ़े पोस्टमैन फर्डी (नसीरुद्दीन शाह) को एक चिट्ठी मिलती है. यह चिट्ठी 46 साल पहले उसने स्टेफैनी फर्नांडीस को लिखा था, जिससे वह प्यार करता था. चिट्ठी मिलते ही फर्डी को पता चलता है कि वह इतने साल से इस अफसोस के साथ जी रहा था कि स्टेफैनी ने उसे रिजेक्ट कर दिया था. अब वह अपने प्यार को पाना चाहता है. एंजी ठान लेती हैं कि फर्डी को स्टेफैनी से वह मिलवाएंगी. इसके लिए वह डॉन पित्रैदो (पंकज कपूर) से उसकी गाड़ी मांगती हैं. पित्रैदो एक फ्रेस्टेटिंग आर्टिस्ट है जो पूरी फिल्म में रोजी का एक पेंटिंग की कोशिश करता रहता है. एंजी पेड्रो से गाड़ी लेती हैं फिर इरिटेटिंग मैकेनिक सेवियो (अर्जुन कपूर) ड्राइवर बनकर उनके साथ जाता है. सैवियो–एंजी से प्यार करता है इसलिए इस ट्रिप पर जाने के लिए तैयार हो जाता है.

फर्डी अपने प्यार को ढ़ुढने जाता है. फर्डी को फैनी तो नहीं मिलती लेकिन पूरे ट्रीप के बाद इन्हें एहसास होता है कि जो हमारे आस पास है हम उन्हें छोड़कर दुनिया में जीने की वजह ढ़ूढ़ रहे हैं.

जब भी बात रोड ट्रिप पर बनी किसी फिल्म की बात आती है तो लगता है कि बोरिंग होगी या फिर स्लो. लेकिन इस फिल्म के साथ ऐसा नहीं है. जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है आप आगे जानने के लिए उत्सुक रहते हैं. यह रोड ट्रिप बहुत ही दिलचस्प है. यह कॉमेडी फिल्म नहीं है लेकिन पंकज कपूर के कुछ डॉयलॉग और सीन्स ऐसे हैं जिनपर आप खुद को हंसने से नहीं रोक  पाएंगे.

अभिनय:
आपको लिए फिल्म देखने की एक वजह यह भी हो सकती है कि फिल्म के पांचो किरदारों ने शानदार अभिनय किया है. लेकिन फिल्म की जान हैं फर्डी या नसीरूद्दीन शाह जिन्होंने अपने किरदार को जीवंत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. उन्होंने गजब के एक्सप्रेशन दिए हैं. चाहें वह इमोशनल सीन हो,  फैनी से दूर होने की वजह से दुखी हों या फिर फैनी के मिलने की बात पर उनके चेहरे की लालिमा.. अपने हर एक सीन में नसीरूद्दीन शाह आपको इंप्रेस कर जाएंगे.
इस फिल्म में रनवीर सिंह कैमियो रोल में हैं लेकिन अगर उनके अभिनय की बात ना करना बेमानी होगी. एक ही सीन में दिखे रनवीर सिंह ने अपनी छाप छोड़ दी है.

फिल्म में रोजी की एक कैट का भी जिक्र है. हालांकि ट्रिप के दौरान ही उसकी मौत हो जाती है. हम यह कह सकते हैं कि फिल्म में इसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन यही कुछ ऐसी बातें हैं जो फिल्म को वास्तविक फील देती हैं.


तो अगर आप भी चालू-मसाला फिल्मों से बोर हो गए हैं और पिछले कुछ दिनों से एक अच्छी फिल्म देखने के इंतजार में हैं तो यह फिल्म जरूर देखें. इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा टाइप फिल्मों से हटकर इस फिल्म से आपको राहत जरूर मिलेगी.

(Follow Pawan Rekha  on Twitter @rekhatripathi, You can also send him your feedback at pawanr@abpnews.in)

Friday, July 18, 2014

रेप, गैंगरेप, खून बहाएँगे फिर उसमें नहाएंगे...


यौन हिंसा के सबसे घृणित रूप सामूहिक बलात्कार ने एक बार फिर से मेरी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. एक बार फिर हवस के नाग से मासूम को डंसा है. जितनी ज्यादा कथित रूप से हम आधुनिकता और प्रगतिशील हो रहे हैं उतनी ही पशुता के नाखून बढ़ते जा रहे हैं. इतिहास और सदी की बर्बरता आधुनिक जीवन में एक नए इरादे और नए हमले से लौट आई है. 


16 दिसंबर में दिल्ली की निर्भया के साथ जो हुआ उसे देश अभी भूला नहीं है.  और  ना ही अपराधियों ने उससे कोई सबक लिया है. हमने सड़कों पर नारे जरूर लगाए, आवाज उठाई, मोमबत्तिया जलाईं और पुलिस के डंडे भी खाए लेकिन उसका नतीज क्या मिला.. लड़कियों के पेड़ पर लटकते हुए शव, स्कूल में गैंगरेप के बाद एक लड़की की हत्या. गिनाने चलें तो लिखने के लिए जगह भी कम पड़ जाए.


बदायूं की घटना को अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब दो नाबालिग लड़कियों को गैंगरेप के बाद मर्डर कर उनका शव पेड़ से लटका दिया गया था. यह लोगों में दहशत फैलाने के लिए किया गया था. लेकिन दरिदंगी का जो खेल यूपी के राजधानी में हुआ है उसे देख तो इंसानियत भी शरमा जाए. पहले गैंगरेप,  फिर डंडे से पीट-पीट कर हत्या, उसके बाद लाश को नंगा करके खुलेआम फेंक दिया गया. ये सब कहीं और नहीं बल्कि लखनऊ के मोहनलाल गंज इलाके के एक स्कूल में हुआ. घटनास्थल पर खून इस कदर फैला हुआ है कि देखकर हैवानियत भी कांप जाए. इसकी जो तस्वीर इंटरनेट पर वायरल हो रही है उसे देखने के बाद इस हैवानियत को बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाय.


लेकिन इतना सब के बाद ऐसा सन्नाटा पसरा है जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं. हैरत यह भी है कि दिल्ली के निर्भया कांड के लिए देश में हर जगह सड़कों पर उतरे लोग चुप हैं.. कहीं विरोध के स्वर नहीं दिख रहे.. अगर लोग आज चुप रहे तो आगे इसका खामियाजा उन्हें अपनी बेटी, बहुओं को बलि चढ़ाकर देनी होगी.  


अब तक रेपिस्ट खुलेआम घूम रहे हैं. मुख्यमंत्री सोशल मीडिया पर मलेशिया विमान हादसे में मरने वाले लोगों के दुख प्रकट कर रहे है लेकिन राजधानी में ही हुए इस हादसे के बारे में अभी तक मुंह नहीं खोल पाए. जो रेपिस्ट आज खुलेआम लोगों के बीच घूम रहे हैं उन्हें किसी का डर नहीं. अगर अब भी पुलिस प्रशासन चुप बैठी रही तो ऐसे अपराधियों के अंदर कभी कानून का डर पैदा नहीं होगा. 


एक हकीकत यह भी है कि अगर ऐसा हो रहा है तो उन्हें शह यूपी सरकार ने दी है. सरकार ने कई मामलों में यह दिखा दिया है कि पुलिस प्रशासन सिर्फ सरकार के तलवे चाटने के लिए है अपराधियों और मुजरिमों को पकड़ने के लिए नहीं. लानत है ऐसे प्रशासन पर. 


इतना जरूर है कि वे रेपिस्ट अब अपनी बड़े ठाट से मूंछे ताने आप लोगों के बीच यही सोचकर चल रहे होंगे कि अरे लड़कियों कि क्या औकात जो हमें 'ना' बोल सकें.. हम जो कहें वो 'ना' करें.. अगर 'ना' करें तो हम करेंगे रेप, गैंगरेप, खून बहाएँगे फिर उसमें नहाएंगे...!! 


लेकिन मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि आखिर कब तक एक एक करके देश की निर्भया अपनी जान गंवाती रहेंगी और सरकार तमाशबीन बनकर देखती रहेगी? हम जो भी चाहें, यह घटनाएं तब तक नहीं रुकेंगी जब तक हम हर ऐसी घटना पर नहीं उबल पड़ते.